एक महिला पत्रकार का सवाल ? अख़बार का कार्टून और पुरा गोदी इकोसिस्टम ऐसे तडपा जैसे सत्ता नहीं श्रध्दा पर हमला होगया हो!

May 20, 2026 - 15:05
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एक महिला पत्रकार का सवाल ? अख़बार का कार्टून और पुरा गोदी इकोसिस्टम ऐसे तडपा जैसे सत्ता नहीं श्रध्दा पर हमला होगया हो!

[ सिटिज़न सारांश ] 

 नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री से सवाल पूछ लिया कि दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल लेने में दिक्कत क्या है ? बस, फिर सोशल मीडिया पर भक्त सेना टूट पड़ी। किसी ने उन्हें विदेशी एजेंट बताया, किसी ने भारत विरोधी। ऐसा माहौल बनाया गया मानो पत्रकार ने सवाल नहीं पूछा बल्कि सीमा पार से हमला कर दिया हो। नॉर्वे के अख़बार Aftenposten में प्रधानमंत्री Narendra Modi का एक कार्टून क्या छपा, देश की गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के स्वयंभू राष्ट्ररक्षकों के पेट में मानो गैस सिलेंडर फट गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर ऐसे चीखने लगे जैसे ओस्लो से सीधा हमला दिल्ली पर हो गया हो। 

मज़ेदार बात देखिए — यही टोली हर बार कहती है कि “विदेशों में मोदी जी का डंका बज रहा है”, “पूरी दुनिया मोदी के सामने झुक रही है”, “मोदी विश्वगुरु हैं”। लेकिन एक कार्टून छपते ही सारा विश्वगुरुत्व हवा हो गया। एक स्केच ने इतनी मिर्ची लगा दी कि पूरा इकोसिस्टम छटपटाने लगा।

समस्या यह है कि भक्त मंडली ने अपने नेता की ऐसी छवि बना दी है जिसमें आलोचना की कोई जगह ही नहीं बची। अंध भक्तो ने नेता को इंसान नहीं, एक अलौकिक प्राणी बना दिया है। इसलिए एक पत्रकार सवाल या अख़बार मे छपा कार्टून भी उन्हें राष्ट्रीय आपदा लगने लगता है। कार्टून मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर एक ऐसे सपेरे के रूप में पेश की गई मानो भारत आज भी सांप, बीन और जादू-टोने के दौर में अटका हुआ कोई उपनिवेश हो। कार्टून के साथ छपी टिप्पणी में मोदी को “चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी” बताया गया। सोशल मीडिया पर इसे लेकर भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली और अनेक लोगों ने इसे नस्लीय तथा औपनिवेशिक मानसिकता का उदाहरण बताया। 

विडंबना देखिए। वही यूरोप, जो दुनिया को सभ्यता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाता है, आज भी भारत को उसी पुराने चश्मे से देखता है, जिसमें यहां की पहचान योग, जादूगर और सपेरों से आगे बढ़ती ही नहीं। अगर यही कार्टून किसी यूरोपीय नेता को लेकर एशिया या अफ्रीका के किसी अख़बार में छपता, तो शायद अगले दिन “रेसिज़्म”, “हेट स्पीच” और “डेमोक्रेटिक वैल्यूज़” पर आपातकालीन बहस शुरू हो चुकी होती। सच ये भी है अख़बार द्वारा भारत की बनाई गई इस छवी को कोई भी देश वासी बर्दाष्त नही करता!

सवाल यह नहीं कि कार्टून सही था या गलत। सवाल यह है कि आखिर लोकतंत्र में व्यंग्य सहने की ताकत किसके पास है? क्योंकि जो सत्ता अपने ऊपर बने एक कार्टून से बेचैन हो जाए, वह आलोचना से कितना डरती होगी, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

 

 

 

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