पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत की सक्रियता, अराघची के भारत दौरे पर दुनिया की नज़र

May 14, 2026 - 14:15
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पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत की सक्रियता, अराघची के भारत दौरे पर दुनिया की नज़र

नई दिल्ली में गुरुवार को उस समय कूटनीतिक हलचल तेज़ हो गई जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सय्यद अब्बास अराघची का स्वागत किया। ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत पहुंचे अराघची का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब पूरा पश्चिम एशिया युद्ध, प्रतिबंधों और समुद्री तनावों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली में हुई यह मुलाक़ात केवल एक औपचारिक राजनयिक बैठक नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की विदेश नीति की दिशा को समझने के लिहाज़ से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

दिल्ली में दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों की स्थिरता तथा क्षेत्रीय शांति जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। माना जा रहा है कि भारत ने इस दौरान एक बार फिर यह संकेत देने की कोशिश की कि वह वैश्विक राजनीति में किसी एक धड़े का हिस्सा बनने के बजाय “रणनीतिक संतुलन” की नीति पर आगे बढ़ रहा है।

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने एक ओर अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल के साथ अपने रक्षा तथा तकनीकी संबंधों को मज़बूत किया है, तो वहीं दूसरी ओर रूस और ईरान जैसे देशों के साथ भी संवाद और सहयोग बनाए रखा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार इसे भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति बताते हैं, जिसमें नई दिल्ली अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध विकसित कर रही है।

ईरान के विदेश मंत्री अराघची की यह यात्रा इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं के लिए लंबे समय तक ईरान और खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहा है। ऐसे में होर्मुज़ जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव भारतीय व्यापार और तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।

सूत्रों के अनुसार, बैठक में चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर भी चर्चा हुई। भारत इन परियोजनाओं को मध्य एशिया और रूस तक पहुंच बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण मानता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिमी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों के बावजूद भारत-ईरान सहयोग आगे बढ़ता है, तो यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

ब्रिक्स मंच पर भी भारत की भूमिका इस बार विशेष रूप से चर्चा में है। संगठन के भीतर ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में भारत एक संतुलित और संवाद आधारित भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। विदेश नीति के जानकार मानते हैं कि नई दिल्ली खुद को “वैश्विक दक्षिण” की एक प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थापित करना चाहती है।

नई दिल्ली में जयशंकर और अराघची की मुलाक़ात ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीति में केवल दर्शक की भूमिका में नहीं रहना चाहता, बल्कि वह क्षेत्रीय स्थिरता, व्यापार और कूटनीतिक संतुलन में सक्रिय भागीदारी निभाने की तैयारी कर रहा है।

 

 

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