प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश.... आरोपी अब्दुल नहीं अमन तिवारी तो दब गई ख़बर...

Apr 11, 2026 - 17:16
Apr 11, 2026 - 18:06
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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश....  आरोपी अब्दुल नहीं अमन तिवारी तो दब गई ख़बर...

बिहार के बक्सर से उठी एक खबर ने अचानक राष्ट्रीय सुरक्षा, मीडिया की प्राथमिकताओं और सियासत के रिश्तों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 22 साल का एक युवक—अमन तिवारी—और उस पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हत्या की कथित साजिश रचने का आरोप। पहली नजर में यह मामला जितना गंभीर लगता है, उतना ही उलझा हुआ भी दिखाई देता है।

पुलिस और जांच एजेंसियों का दावा है कि आरोपी ने विदेशी एजेंसियों से संपर्क साधने की कोशिश की, यहां तक कि कथित तौर पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी से भी जुड़ने की बात सामने आई। बदले में उसने बड़ी रकम की मांग की और 22 दिनों के भीतर हत्या को अंजाम देने की बात कही। सवाल यह है कि क्या यह वाकई कोई संगठित साजिश थी, या फिर एक भटके हुए दिमाग की खतरनाक कल्पना?

यहीं से कहानी का दूसरा पहलू शुरू होता है—मीडिया का रवैया।

देश के कुछ हिस्सों में यह आवाज उठी कि “इतनी बड़ी खबर को दबा दिया गया। अमन तिवारी की जगह अब्दुल होता तो, क्या इतनी बडी ख़बर को मिडिया आई,गई कर देता? ” लेकिन हकीकत यह है कि खबर पूरी तरह गायब नहीं थी, कई अखबारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यह रिपोर्ट हुई। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि जिस स्तर की सनसनी या प्राइम टाइम बहसें अक्सर देखने को मिलती हैं, वैसी गूंज इस मामले में नहीं बनी।

अब सवाल उठता है—क्यों?

क्या इसलिए कि मामला शुरुआती जांच के दौर में था और ठोस सबूत अभी सामने नहीं आए थे?

या इसलिए कि इस तरह की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से बेवजह डर और अफवाह फैल सकती है ? लेकिन ऐसे कई मामले है, जिनको मिडीया ने एक सांप्रदाय विषेश को कटघरे मे खडा कर बढा चढा कर पेश किया! मिडीया के गैर ज़िम्मेदाराना रवय्ये के चलते कई बेगुनहा लोगो को सालो जेल मे गुज़ाने पडे, उनकी ज़िंदगी सिर्फ़ इसलिए तबहा होगई क्यों कि वह अमन तिवारी नही, अब्दुल थे!

यहां मीडिया की जिम्मेदारी और उसकी सीमाओं के बीच की लकीर साफ दिखाई देती है। एक तरफ TRP और सनसनी का दबाव, दूसरी तरफ तथ्यों की पुष्टि का दायित्व। हर खबर को ‘ब्रेकिंग’ बनाना आसान है, लेकिन हर ‘ब्रेकिंग’ सच के करीब हो—यह जरूरी नहीं।

अमन तिवारी का अतीत भी इस केस को और पेचीदा बनाता है। पहले की संदिग्ध गतिविधियां, धमकी देने के आरोप—ये सब इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मामला सिर्फ एक दिन या एक घटना का नहीं, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा हो सकता है। लेकिन क्या यह पैटर्न किसी बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है, या फिर एक अकेले व्यक्ति की मानसिक और सामाजिक परिस्थितियों का नतीजा है—यह जांच का विषय है।

सियासत भी इस तरह के मामलों से दूर नहीं रहती। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ बड़ी साजिश बताकर सख्त कार्रवाई की मांग करता है, तो दूसरा पक्ष जांच की पारदर्शिता और मीडिया कवरेज पर सवाल उठाता है। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

आखिर में सबसे जरूरी बात यही है कि ऐसे मामलों में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना खतरनाक हो सकता है। जांच एजेंसियों को अपना काम करने देना चाहिए, और मीडिया को भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी चाहिए—न कम, न ज्यादा। अब्दुल, अमन मे बिना भेदभाव किए!

क्यों कि लोकतंत्र में सिर्फ साजिशें ही नहीं, बल्कि सच्चाई भी जांच के दायरे में होती है।

अली रज़ा आबेदी 

 

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