“बेरोजगार युवा कॉकरोच हैं ?” मुख्य न्यायमूर्ती सूर्यकांत की टिप्पणी और लोकतंत्र पर उठते गंभीर सवाल...?
सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायमूर्ती सूर्यकांत द्वारा बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा कि कुछ बेरोजगार युवा “कॉकरोच” की तरह सिस्टम में घुसकर सोशल मीडिया, RTI और अन्य माध्यमों से व्यवस्था पर हमला करते हैं।
यह बयान केवल एक शब्द नहीं था, बल्कि उस मानसिकता की झलक था जिसमें सवाल पूछने वाला युवा अब नागरिक नहीं, बल्कि “समस्या” बन चुका है। जिस देश में करोड़ों पढ़े-लिखे नौजवान वर्षों तक नौकरी की प्रतीक्षा में अपनी जवानी खपा देते हैं, जहाँ भर्ती परीक्षाएँ बार-बार रद्द होती हैं, पेपर लीक होते हैं और सरकारी पद खाली पड़े रहते हैं — वहाँ बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से करना केवल असंवेदनशीलता नहीं बल्कि सामाजिक अपमान है।
देश का युवा आज नौकरी माँग रहा है, भीख नहीं। वह रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करता है। यदि वही युवा RTI लगाता है, सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा लिखता है या व्यवस्था से सवाल करता है, तो क्या वह लोकतंत्र विरोधी हो जाता है? या फिर लोकतंत्र अब केवल ताली और थाली बजाने वालों तक सीमित कर दिया गया है?
विडंबना यह है कि चुनावी मंचों पर यही युवा “देश का भविष्य” कहलाता है। सरकारें “डेमोग्राफिक डिविडेंड” का सपना दिखाती हैं, स्टार्टअप और स्किल इंडिया के विज्ञापन चलाए जाते हैं, मगर जब वही युवा अपनी डिग्री लेकर नौकरी के लिए भटकता है और आवाज उठाता है, तब सत्ता और संस्थानों की नजर में वह “कॉकरोच” बन जाता है।
मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के शब्दों का वजन केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता। उनके वक्तव्य समाज की सोच को प्रभावित करते हैं। ऐसे में यदि देश का सर्वोच्च न्यायिक पद बेरोजगार युवाओं के लिए इस तरह की भाषा इस्तेमाल करता दिखे, तो यह चिंता का विषय है। न्यायपालिका से अपेक्षा संवेदनशीलता, संतुलन और संविधान की आत्मा की रक्षा की होती है, न कि संघर्ष कर रहे युवाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने की।
आज देश का सबसे बड़ा संकट केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि बेरोजगारों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता है। व्यवस्था नौकरियाँ देने में विफल हो सकती है, लेकिन कम-से-कम सम्मानजनक भाषा तो बरत सकती है। क्योंकि किसी युवा की जेब खाली हो सकती है, मगर उसका आत्मसम्मान नहीं।
यदि सवाल पूछना “कॉकरोच” होना है, तो फिर लोकतंत्र की परिभाषा पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि संविधान नागरिकों को आवाज देता है, चुप्पी नहीं।
युवाओं पर दिए गए विवादित बयान पर मुख्य न्यायाधीश का स्पष्टीकरण
युवाओं को लेकर दिए गए अपने कथित विवादास्पद बयान पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी को संदर्भ से काटकर पेश किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य युवाओं का अपमान करना नहीं, बल्कि रोजगार और कार्य संस्कृति से जुड़े मुद्दों की ओर ध्यान दिलाना था।
सोशल मीडिया पर वायरल दावों में कहा गया था कि मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना “कॉकरोच” से की, जिसके बाद विभिन्न संगठनों और लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत की टिप्पणियों को पूरे संदर्भ में समझना आवश्यक है।
अली रज़ा आबेदी
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