नगरसेवक मतीन पटेल नही किसी और शख्स के घर पर चला बुल्डोज़र, मनपा की कार्रवाई पर कोर्ट भी हैरान
[ अली रज़ा आबेदी ] नासिक धर्मांतरण प्रकरण की आरोपी निदा ख़ान को अपने घर में शरण देने के आरोप में सह-आरोपी बनाए गए AIMIM नगरसेवक मतीन पटेल के कथित मकान पर छत्रपति संभाजीनगर महानगरपालिका द्वारा की गई बुल्डोज़र कार्रवाई अब गंभीर कानूनी विवाद में घिरती दिखाई दे रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने मनपा की कार्रवाई पर प्रारंभिक तौर पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए मामले में विस्तृत सुनवाई के संकेत दिए हैं।
नारेगांव स्थित जिस मकान को मतीन पटेल का बताकर महानगरपालिका के अतिक्रमण विभाग ने अवैध निर्माण घोषित किया, वह मकान वास्तव में हनिफ़ ख़ान युसुफ़ ख़ान के नाम पर होने की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि मतीन पटेल के रिश्तेदार अस्थायी रूप से वहां ठहरने वाले थे, इसलिए हनिफ़ ख़ान ने अपना खाली पड़ा घर उपयोग के लिए मतीन पटेल को सौंपा था।
जानकारी के अनुसार, जिस घर से पुलिस ने निदा ख़ान को गिरफ्तार किया था, वह मकान 12 मार्च 2026 को हनिफ़ ख़ान और सय्यद सरवर ने अमीर ख़ान सरवर ख़ान से विधिवत रजिस्टर्ड दस्तावेजों के आधार पर संयुक्त रूप से खरीदा था। इसके बावजूद महानगरपालिका ने उक्त मकान को मतीन पटेल का “अवैध निर्माण” बताते हुए नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू कर दी।
सामने आए दोनों नोटिसों से कई महत्वपूर्ण कानूनी विसंगतियां उजागर हो रही हैं।
पहले नोटिस में संबंधित संपत्ति का नाम “मतीन पटेल” (मतीन शेख़ ) के रूप में दर्ज दिखाई देता है, जबकि दूसरे नोटिस में उसी स्थान पर पेन से काटछांट कर “हनिफ़ ख़ान” का नाम जोड़ा गया है। यह बदलाव इस बात की ओर संकेत करता है कि कार्रवाई से पहले संपत्ति स्वामित्व की स्वतंत्र और वैधानिक जांच संभवत नहीं की गई।
दोनों नोटिस महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम की धारा 260 के अंतर्गत जारी किए गए हैं, लेकिन इनमें कथित अवैध निर्माण का स्पष्ट सर्वे नंबर, मंजूर नक्शा, निर्माण की तिथि, घर नंबर स्वामित्व दस्तावेजों की जांच अथवा सक्षम तकनीकी रिपोर्ट का उल्लेख नहीं दिखाई देता। कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पहले वास्तविक मालिक की पहचान, स्वामित्व सत्यापन और पर्याप्त सुनवाई का अवसर देना प्रशासनिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।
नोटिसों में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि 9 मई 2026 को महानगरपालिका कर्मचारियों द्वारा हाथ से नाम बदलकर नोटिस घर के दरवाजे पर चस्पा किया गया। सवाल यह उठ रहा है कि यदि संपत्ति वास्तव में हनिफ़ ख़ान की थी, तो प्रारंभिक नोटिस मतीन पटेल के नाम से किस आधार पर जारी किया गया?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत में यह साबित हो जाता है कि कार्रवाई गलत व्यक्ति की संपत्ति मानकर की गई, तो महानगरपालिका की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के दायरे में आ सकती है। साथ ही प्रशासन पर राजनीतिक प्रेरणा से कार्रवाई करने के आरोप भी और तेज हो सकते हैं।इस कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट में तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि प्रशासन ने पर्याप्त समय दिए बिना जल्दबाज़ी में कार्रवाई की और जवाब प्रस्तुत करने का उचित अवसर नहीं दिया गया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह जानना चाहा कि जब मामला न्यायिक प्रक्रिया में था, तब इतनी त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता क्यों पड़ी। अदालत ने मनपा प्रशासन से कार्रवाई की प्रक्रिया, नोटिस और समयसीमा को लेकर जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि संबंधित संपत्तियों में कुछ हिस्से ऐसे थे जिनमें परिवार निवास कर रहा था तथा कुछ निर्माणों को नियमित करने की प्रक्रिया चल रही थी। अदालत ने इस पहलू पर भी मनपा से स्पष्टीकरण मांगा है।
खंडपीठ ने फिलहाल याचिकाकर्ताओं को दिवानी आवेदन दाखिल करने की अनुमति देते हुए मामले की अगली सुनवाई 18 मई को निर्धारित की है। इस बीच मनपा की कार्रवाई और उसके कानूनी आधार को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस तेज हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबकी निगाहें 18 मई 2026 को होने वाली अदालत की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय हो सकता है कि बुल्डोज़र कार्रवाई प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुई थी या जल्दबाज़ी में की गई त्रुटिपूर्ण कार्रवाई थी।
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