जंग से कुर्सी बचाने का खेल? नेतन्याहु के फैसलों से डगमगाया सीज़फ़ायर
मध्य-पूर्व की फिज़ा में कुछ समय पहले तक “सीज़फ़ायर” की जो हल्की सी उम्मीद जगी थी, वह अब धुएं में तब्दील होती नजर आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुआ युद्धविराम एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी बताया गया था, लेकिन लेबनान पर इज़रायल के ताज़ा मिसाइल हमलों ने इस समझौते को टूटने के कगार पर ला खड़ा किया है।
काग़ज़ों पर अमन का एलान है, मगर ज़मीन पर धमाकों की गूंज साफ बता रही है कि हालात काबू से बाहर हो रहे हैं। बेरूत और दक्षिणी लेबनान में जारी हमले इस बात का संकेत हैं कि यह सीज़फ़ायर सीमित दायरे में ही कैद है—और शायद अब वह दायरा भी बिखरने लगा है।
इज़रायल के वज़ीरे-आज़म बेंजामिन नेतन्याहू का रुख इस पूरे संकट का सबसे अहम और विवादित पहलू बन गया है। एक तरफ अमेरिका-ईरान के बीच जंग बंदी की बात होती है, दूसरी तरफ लेबनान में इज़रायली कार्रवाई तेज़ कर दी जाती है। यह विरोधाभास ही आज के तनाव की असली वजह बन चुका है।
सवाल उठता है—क्या यह महज़ सैन्य रणनीति है, या इसके पीछे गहरी सियासत छिपी है?
हकीकत यह है कि बेंजामिन नेतन्याहू इस वक्त अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, अदालत में चल रहे केस, और सत्ता से बेदख़ल होने का खतरा—ये सब मिलकर उनकी स्थिति को कमजोर बनाते हैं। उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू का नाम भी विवादों में रहा है, जिससे दबाव और बढ़ जाता है।
ऐसे माहौल में यह आरोप और तेज़ हो गए हैं कि जंग को लंबा खींचना उनकी सियासी मजबूरी बन चुका है। क्योंकि जैसे ही हालात सामान्य होंगे, वैसे ही जनता और न्यायपालिका का ध्यान फिर उन्हीं मामलों पर लौट आएगा, जिनसे बचना उनके लिए मुश्किल हो सकता है।
अब इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका–ईरान सीज़फ़ायर की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। यह समझौता मूल रूप से बड़े टकराव को रोकने के लिए किया गया था, लेकिन लेबनान पर हो रहे हमलों ने इसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। इज़राइल लेबनान को इरान युध्द समझोते से अलग बता रहा है! ऐसा लगता है डोनाल्ड ट्रम्प नेतन्याहू के सामने पुरी तरह से हतप्रभ होकर रहे गए है!ट्रम्प की पुरी बागडोर नेतन्याहू के हाथ मे है!दुसरी ओर इरान पहले ही संकेत दे चुका है कि अगर लेबनान पर मिसाइल हमलो का सिलसिला नहीं रुका, तो वह इस समझौते से पीछे हट सकता है।
यानी जिस सीज़फ़ायर को एक “राहत” माना जा रहा था, वही अब एक “कमज़ोर कड़ी” बन गया है—जो किसी भी वक्त टूट सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि बेंजामिन नेतन्याहू कीआक्रामक नीति न सिर्फ इस सीज़फ़ायर को कमजोर कर रही है, बल्कि अमेरिका को भी एक बड़े संघर्ष की ओर धकेल सकती है। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो यह टकराव क्षेत्रीय से बढ़कर वैश्विक संकट में बदल सकता है।
लेबनान में गिरते बम सिर्फ इमारतों को नहीं तोड़ रहे, बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ रहे हैं जो हाल ही में बने इस समझौते से जुड़ा था। हर नया हमला इस बात का एलान करता है कि अमन की कोशिशें कितनी नाज़ुक हैं।
सवाल अब भी वही है—क्या यह सीज़फ़ायर बच पाएगा, या लेबनान की आग इसे पूरी तरह राख कर देगी?
अली रज़ा आबेदी
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