खामोश तलवार का रहस्य: हज़रत अली (अ.स.) का सब्र और इतिहास के कठिन सवाल...?
इस्लाम के आग़ास ( प्रारम्भिक ) इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जिन पर सदियों से चिंतन और विमर्श होता रहा है। यह केवल इतिहास का विषय नहीं बल्कि नैतिकता, नेतृत्व और समाज की एकता का भी प्रश्न है। पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.स.की वफ़ात के बाद का समय ऐसा ही एक दौर था।
उसी समय इस्लामी समाज को यह तय करना था कि नेतृत्व ( क़यादत ) किसके हाथ में होगी और नए बने समाज को किस प्रकार स्थिर रखा जाएगा। इस दौर में पैग़म्बर के चचेरे भाई और दामाद अली इब्ने अबितालिब अ.स. की भूमिका, उनका धैर्य और उनका निर्णय आज भी इतिहासकारों और विद्वानों के लिए विचार का विषय है।
शिया परंपरा के अनुसार उस समय अहले-बैत पर अनेक कठिन परिस्थितियाँ आईं, जिनमें सत्ता का विवाद, फ़िदक़ की भूमि का मामला और जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) के साथ हुए घटनाक्रम का उल्लेख किया जाता है।
लेकिन इन सभी घटनाओं के बीच एक मूल प्रश्न हमेशा उठता है—
इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद हज़रत अली (अ.स.) ने संघर्ष ( युध्द ) का मार्ग ( रास्ता ) क्यों नहीं चुना और धैर्य ( सब्र ) का रास्ता क्यों अपनाया?
सन् 632 ईस्वी में पैग़म्बर मुहम्मद स.स. की वफ़ात के बाद मदीना में नेतृत्व ( क़यादत ) का सवाल सामने आया। उसी समय एक बैठक हुई जिसे इतिहास में बनी सख़िफ़ा (Saqifah Meeting) के नाम से जाना जाता है।
इस बैठक का उल्लेख ( ज़िक्र ) कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें प्रसिद्ध इतिहासकार Muhammad ibn Jarir al-Tabari की किताब Tarikh al-Tabari और Ibn Qutaybah की रचना Al-Imamah wa al-Siyasah शामिल हैं।
शिया परंपरा के अनुसार उस समय हज़रत अली अ.स. और पैग़म्बर स.स. के परिवार के लोग रसूल स.स.के अंतिम संस्कार की व्यवस्था में लगे हुए थे। इसी दौरान नेतृत्व का निर्णय हो गया और इस विषय पर आगे चलकर मतभेद पैदा हुए।
कई शिया स्रोतों में वर्णन मिलता है कि हज़रत अली से बैअत लेने के लिए दबाव डाला गया।
इस संदर्भ का उल्लेख जिन ग्रंथों में मिलता है उनमें प्रमुख हैं:
Kitab Sulaym ibn Qays
Al-Ihtijaj (लेखक: Ahmad ibn Ali al-Tabarsi)
Bihar al-Anwar (लेखक: Allama Muhammad Baqir al-Majlisi)
इन ग्रंथों में यह वर्णन मिलता है कि उस समय अली (अ.स.) के घर के बाहर तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई थी।
अहले-बैत के इतिहास का सबसे संवेदनशील और दुखद अध्याय जनाबे Fatimah al-Zahra से जुड़ी घटनाएँ हैं।
शिया स्रोतों में वर्णन मिलता है कि अली (अ.स.) के घर के बाहर हुए तनावपूर्ण घटनाक्रम में उन्हें चोट पहुँची। इन विवरणों का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है, जिनमें शामिल हैं:
Kitab Sulaym ibn Qays
Dalail al-Imamah
Bihar al-Anwar
इन्हीं रिवायतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस घटना के कारण गर्भ ( शिकम ) में मौजूद Muhsin ibn Ali अ.स. की शहादत हुई।
यह विवरण मुख्यतः शिया और सुन्नी दोनो की किताबो में मिलता है और इसे अहले-बैत के इतिहास का अत्यंत दुखद अध्याय माना जाता है।
रसूल की वफ़ात के बाद एक और महत्वपूर्ण विवाद Fadak नामक भूमि( बाग़ ) को लेकर हुआ।
शिया विद्वानों का मत है कि यह भूमि पैग़म्बर ने अपनी बेटी फ़ातिमा (स.अ.) को दी थी। लेकिन बाद में इस पर विवाद खड़ा हुआ।
इस विषय का ज़िक्र कई किताबो में मिलता है:
शिया स्रोत
Al-Kafi (लेखक: Muhammad ibn Yaqub al-Kulayni)
Bihar al-Anwar
सुन्नी स्रोत
Sahih al-Bukhari (लेखक: Muhammad al-Bukhari)
Tarikh al-Tabari
इन ग्रंथों में फ़िदक़ के विवाद और जनाबे फ़ातिमा की नाराज़गी का उल्लेख ( ज़िक्र ) मिलता है। उनसे पूछा गया
“आप फ़िदक़ क्यों नहीं लेते?”
उन्होंने जवाब दिया:
“ज़ालिम और मज़लूम दोनों इस दुनिया से जा चुके हैं।
अल्लाह ने मज़लूम को उसका सवाब दे दिया और ज़ालिम को उसका हिसाब मिल गया।”
एक और शिया रिवायत में इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) फरमाते हैं:
“हम अहल-ए-बैत लोगों के हक़ उन्हें लौटाते हैं,
लेकिन अपना हक़ अल्लाह के हवाले कर देते हैं।”
इस्लामी इतिहास में बाद के दौर में, विशेषकर उमय्यद शासन के समय, मिम्बरों से हज़रत अली के खिलाफ़ ख़ुतबे दिये जाने का उल्लेख ( ज़िक्र) मिलता है।
इतिहासकार al-Tabari और al-Masudi ने अपनी किताबो में इस का ज़िक्र किया है।
यह रिवाज बाद में खलीफा Umar ibn Abd al-Aziz ने इसे बंद करने का आदेश दिया। तब बंद हुआ!
इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि इन सब घटनाओं के बावजूद हज़रत अली ने संघर्ष का मार्ग ( रास्ता) क्यों नहीं चुना।
इसका उत्तर ( जवाब ) स्वयं अली (अ.स.) के कथनों में मिलता है, जो Nahj al-Balagha में दर्ज हैं।
उन्होंने अपनी हालात का ज़िक्र करते हुए कहा कि उन्होंने धैर्य ( सब्र) किया, जबकि उनकी स्थिति ऐसी थी जैसे आँख में काँटा और गले में हड्डी अटकी हो।
शिया विद्वानों के अनुसार उस समय:
इस्लाम अभी नया था
अरब के कई क़बीले विद्रोह की स्थिति में थे
समाज में गृहयुद्ध का खतरा था
ऐसी स्थिति में यदि संघर्ष होता तो इस्लाम और इस्लामी समाज गंभीर संकट में पड़ सकता था।
जब आगे चलकर हज़रत अली स्वयं खलीफा बने, तब भी उन्होंने फ़िदक़ की भूमि को अपने परिवार के लिए वापस नहीं लिया।
कई विद्वानों के अनुसार इसके पीछे उनकी यह सोच थी कि उनकी सरकार को व्यक्तिगत विवादों का मंच न बनाया जाए बल्कि न्याय और प्रशासनिक सुधार पर ध्यान दिया जाए।
इस विषय पर शिया विद्वानों जैसे Sharif al-Radi, al-Mufid और Allama Muhammad Baqir al-Majlisi ने विस्तार से लिखा है।
हज़रत अली (अ.स.) के जीवन का यह दौर केवल इतिहास नहीं बल्कि नैतिक नेतृत्व का उदाहरण है।
उन्होंने यह दिखाया कि कभी-कभी सबसे बड़ी शक्ति ( ताक़त ) तलवार उठाने में नहीं बल्कि धैर्य ( सब्र ) रखने में होती है।
उनका निर्णय इस बात का प्रतीक था कि समाज की एकता, न्याय और धर्म की रक्षा व्यक्तिगत अधिकारों से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी कारण इतिहास में अली (अ.स.) को केवल एक महान योद्धा नहीं बल्कि न्याय, ( इन्साफ़ ) धैर्य
( सब्र ) और आध्यात्मिक नेतृत्व ( रूहानी क़यादत ) के आदर्श के रूप में याद किया जाता है।
अली रज़ा आबेदी !
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