वेज बिर्यानी V/S वेज पुलाव... सोशल मिडीया पर छिडी जंग... नाम बदलो वर्ना मत बेचो !

Jun 8, 2026 - 21:48
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पुलाव” दरअसल फारसी शब्द “پلو / polow (polu)” से निकला है, जिसका अर्थ है चावल से बना मिश्रित व्यंजन।

इसी से तुर्की में “pilav” और अरबी में “pilaf” जैसे रूप विकसित हुए।

भारत में यह शब्द मुगलकाल के दौरान आया, जब फारसी भाषा दरबार और प्रशासन की प्रमुख भाषा थी।

भारत में प्रवेश

मध्य एशिया और ईरान से आए व्यंजन और पाक परंपराओं के साथ यह शब्द भारतीय उपमहाद्वीप में पहुँचा।

मुगल शासन के समय यह विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ और धीरे-धीरे हिंदी, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं में “पुलाव” के रूप में स्थापित हो गया।

सांस्कृतिक विस्तार

आज “पुलाव” शब्द सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि एक व्यापक खाना बनाने की शैली को दर्शाता है, जिसमें चावल को मसालों, सब्जियों या मांस के साथ पकाया जाता है। इसका समान रूप कई देशों में अलग-अलग नामों से मिलता है, जैसे:

ईरान: Polow

तुर्की: Pilav

मध्य एशिया: Plov

,“पुलाव” की जड़ें फारसी भाषा और मध्य एशियाई पाक परंपराओं में हैं, जो बाद में भारतीय भोजन संस्कृति का ह

विशेष रिपोर्ट | व्यंग्य स्तंभ

देश के सोशल मीडिया और कुछ वैचारिक मंचों पर इन दिनों एक अजीब तरह की बहस तेज़ हो गई है। मुद्दा कोई राजनीतिक कानून या अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक साधारण-सा व्यंजन है—व्हेज बिर्यानी बनाम व्हेज पुलाव! और इस नैरेटिव को गढने मे लगे है नफ़रती गैंग के हिंदुत्वादी गोबर भक्त जिन्हे हर एक बात मे हिंदु मुस्लिम का ऍंगल तलाश करने मे बडा ही आनंद आता है!

बहस का केंद्र यह नहीं कि थाली में क्या परोसा जा रहा है, बल्कि यह है कि उसे “क्या कहा जाना चाहिए”।

उतरा खंड से आया एक विडीयो तो बडा ही मजेदार है! इसमे एक व्यक्ती बिर्यानी शब्द को "हैद्राबाद " से आया बता रहा है और दुकानो पर जा जा कर व्हेज पुलाव के पोस्टर चस्पा कर रहा है!

अब इन जैसे धर्म रक्षक, संस्कृती रक्षक और भाषा रक्षको को कौन समझाए बिर्यानी हो या पुलाव दोनो ही पर्शियन या फ़ारसी के शब्द है! पुलाव शब्द मुग़लो से भारत मे प्रचरीत हुआ! कर दिया ना मज़ा किर किरा " ये बेचारे अथक प्रयास कर मुग़लो का नाम हटाने मे जुटे है " और मुग़ल है कि शनी की तरह इन की कुंडली मे बैठे है " भाईयों को हिंदु कहेने पर गर्व था पता चला ये नाम भी मुग़लो का दिया है अब किसी तरह व्हेज पुलाव कहेकर लिख कर आत्म संतुष्ठी करना चहाते थे तो यहां भी मुग़लो का पहेले से ही डेरा है!

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी बहस में खाना लगभग पीछे छूट गया है, और शब्द आगे निकल आए!

सोशल मीडिया पर यह मुद्दा अब दो हिस्सों में बंट चुका है—

एक ओर “परंपरा , धर्म और शुद्धता” की बात,

और दूसरी ओर “व्यावहारिकता और आधुनिक नामकरण” की दलील।

सिटिज़न सारांश 

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