सोनिया गांधी का लेख: क्या भारत की इज़राइल नीति पर उठ रहे हैं नए सवाल ?

Jun 29, 2026 - 21:17
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सोनिया गांधी का लेख: क्या भारत की इज़राइल नीति पर उठ रहे हैं नए सवाल ?

[ सिटिज़न सारांश ] कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अंग्रेज़ी दैनिक द इंडियन एक्स्प्रेस में प्रकाशित अपने लेख "India Remains Silent on Gaza, While the World Continues to Speak Up" के माध्यम से केंद्र सरकार की पश्चिम एशिया नीति, विशेषकर गाज़ा संकट पर भारत के रुख को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सोनिया गांधी का तर्क है कि भारत ने दशकों तक फ़िलिस्तीन के अधिकारों का समर्थन करते हुए इज़राइल के साथ भी संतुलित संबंध बनाए रखे थे, लेकिन हाल के वर्षों में यह संतुलन कमजोर हुआ है। उनके अनुसार, गाज़ा में जारी मानवीय संकट और बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत के बावजूद भारत की अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया उसकी ऐतिहासिक विदेश नीति और नैतिक प्रतिबद्धताओं से मेल नहीं खाती।

लेख में उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की चुप्पी ने भारत को केवल नैतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान हमेशा एक ऐसे देश की रही है जो न्याय, शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में स्पष्ट आवाज़ उठाता रहा है। यदि भारत ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर मौन रहता है, तो उसकी वैश्विक विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि भारत को युद्धविराम, मानवीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सम्मान तथा दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उनका मानना है कि भारत को अपनी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति की परंपरा को पुनः मजबूत करना चाहिए।

हालांकि इस लेख पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा ने कांग्रेस पर विदेश नीति का राजनीतिकरण करने और "वोट बैंक की राजनीति" करने का आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होती है और सरकार फ़िलिस्तीन को मानवीय सहायता देने के साथ-साथ इज़राइल के साथ अपने रणनीतिक संबंध भी बनाए हुए है।

सोनिया गांधी का यह लेख ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और कूटनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। भारत के लिए इज़राइल रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और प्रौद्योगिकी का महत्वपूर्ण साझेदार है, वहीं फ़िलिस्तीन के साथ उसके ऐतिहासिक और कूटनीतिक संबंध भी लंबे समय से रहे हैं। ऐसे में भारत की विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की है।

यह लेख केवल गाज़ा युद्ध पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति की दिशा, नैतिक नेतृत्व और वैश्विक भूमिका पर एक व्यापक राजनीतिक बहस को भी सामने लाता है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद और राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रमुख चर्चा का विषय बन सकता है।

 

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