सय्यद अली ख़ामनाइ की मौत पर ग़म का माहौल, भारत में शिया समुदाय का शांतिपूर्ण एहतिजाज, सरकार की खामोशी पर सवाल... ?
[अली रज़ा आबेदी ] ईरान के सुप्रीम लीडर सय्यद अली ख़ामनाइ की शहादत की ख़बर के बाद दुनिया भर में ग़म और ग़ुस्से का माहौल देखा जा रहा है। हमारे मुल्क भारत में भी बड़ी तादाद में शिया समुदाय सड़कों पर उतरकर अपने जज़्बात का इज़हार कर रहा है।
लेकिन इसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ अतिवादी हिंदू ग्रुप्स की तरफ़ से उल-जुलूल बयान सामने आ रहे हैं, और सरकार की तरफ़ से खामोशी रहने के कारण शिया समाज अपने आपको थोड़ा ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के कामकाज में बेहद व्यस्त रहते हैं, ये बात सब जानते हैं। लेकिन सदियों से भारत का दोस्त रहा ईरान—जो मुश्किल वक्त में भी भारत के साथ खड़ा रहा—उसके सुप्रीम लीडर की परिवार समेत मौत पर कम से कम दुख जताने का वक्त नहीं मिला, या विदेश नीति के बदलते हालात की वजह से बयान नहीं आया, ये हम नहीं जानते।
इसी तरह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, जो लखनऊ से सांसद हैं और जहां शिया समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, उनकी तरफ़ से भी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। शिया समाज का एक बड़ा वर्ग अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से भाजपा को समर्थन देता आया है—खासतौर पर उस वादे की वजह से जिसमें लखनऊ में बंद मोहर्रम का जुलूस फिर से शुरू कराने की बात हुई थी, और वो पूरा भी हुआ। उसी भरोसे पर आज भी शिया समाज का एकमुश्त वोट राजनाथ सिंह को मिलता रहा है, लेकिन इस दुख की घड़ी में उनकी खामोशी लोगों को अखर रही है।
सरकार की खामोशी और सोशल मीडिया पर आ रही भड़काऊ पोस्ट शिया समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही हैं। सरकार को चाहिए कि इस मामले का संज्ञान ले।
भारतीय शिया समाज शांति और कानून व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए अपना विरोध दर्ज कर रहा है, और यह हमारा संवैधानिक अधिकार भी है। हमारा विरोध सरकार से नहीं, बल्कि ज़ुल्म और बर्बरता के खिलाफ है।
लोकतंत्र में जब लोग शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरते हैं, ज्ञापन देते हैं और अपने जज़्बात जिम्मेदार तरीक़े से सामने रखते हैं, तभी सरकार तक जनभावना सही तरीके से पहुंचती है। सिर्फ इमामबाड़ों या आशूरखानों में मजलिस करके, या गली में कैंडल मार्च कर के अख़बार में फोटो छपवा देने और सोशल मीडिया पोस्ट डालने से हम “गली के शेर” तो बन सकते हैं, लेकिन सरकार तक अपनी बात मजबूत तरीके से नहीं पहुंचा सकते।
इसलिए ज़रूरी है कि प्रशासन से इजाज़त लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन किया जाए, एक लिखित ज्ञापन तैयार किया जाए और ज़िला अधिकारी या डिविजनल कमिश्नर को प्रतिनिधिमंडल के रूप में सौंपा जाए, ताकि हमारी भावनाएं सही मंच तक पहुंच सकें।
ध्यान रहे—प्रदर्शन के दौरान कोई आपत्तिजनक नारे न लगें और कोई ऐसा कदम न उठे जिससे कानून व्यवस्था प्रभावित हो। कानून व्यवस्था बनाए रखना हमारी भी जिम्मेदारी है, क्योंकि देश हमारा है और हम सब जिम्मेदार नागरिक हैं।
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