“खोखले नारों का सच: पश्चिम के नारीवाद पर हफ़सा सिद्दीकी का करारा प्रहार”
यह आर्टिकल दैनिक सिटीज़न सारांश बहेन हफ़सा सिद्दीकी के फ़ेसबुक पेज से अपने पाठकों तक पहुंचा रहा है। महोतरमा हफ़सा सिद्दीकी ने पश्चिम के खोकले नारीवाद पर, बडी बेबाकी से प्रहार किया है। धन्यवाद बहेन हफ़सा सिद्दीकी।
कल अयातुल्ला सैय्यद अली ख़ामनेई की शहादत के बाद कुछ हलक़ो में फिर वही घिसा-पिटा शोर सुनाई दे रहा है। कुछ लोग इरान की सड़कों पर 'आज़ादी' के नारे और ख़ामनेई साहब के 'कट्टरपंथ' पर सवाल उठा रहे हैं। दलील दी जा रही है कि ईरान बहुत कट्टर मुल्क है और वहां औरतों पर पाबंदियां हैं।
लेकिन इन पाबंदियों पर बात करने से पहले हमें उन 'महान देशों' और उनकी 'महान प्रोग्रेसिव कल्चर' के अंदरूनी सड़न को भी देखना होगा, जो आज औरतों की मसीहा बनी फिरती हैं।
हक़ीक़त तो यह है कि जिसे 'इक्वालिटी' का नाम दिया गया, वह असल में औरत का इस्तेहसाल (शोषण) है। पश्चिम ने औरत को घर से बाहर तो निकाला, लेकिन उसे घर और दफ़्तर दोनों का 'मज़दूर' बना दिया। वहां समानता के नाम पर प्रेग्नेंसी के आख़िरी दिनों तक और डिलीवरी के फौरन बाद काम पर लौटना मजबूरी है। जिस वक्त एक माँ को आराम और अपने बच्चे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उसे 'इकोनॉमिक ग्रोथ' की वेदी पर क़ुर्बान कर दिया जाता है।
यहीं से शुरू होता है 'तरबियत का क़त्ल'। छोटे-छोटे बच्चों को 'डे-केयर' और अजनबियों के रहम-ओ-करम पर छोड़ दिया जाता है। बच्चा सिर्फ खाना और खिलौना नहीं मांगता, उसे वह 'इमोशनल एंकर' चाहिए होता है जो सिर्फ माँ की ममता और बाप के साये से मिलता है। अजनबियों के हाथ पलने वाला बच्चा तरबियत नहीं, सिर्फ ज़िंदा रहने के तरीके़ सीखता है। वह जज़्बाती तौर पर खोखला हो जाता है और उसके अंदर से 'फैमिली बॉन्डिंग' का वजूद ही ख़त्म हो जाता है।
इसके अलावा वहां 'सिंगल मदरहुड' को एक कूल ट्रेंड की तरह बेचा जाता है, लेकिन हक़ीक़त में यह औरत पर पहाड़ तोड़ने जैसा है। एक अकेली औरत घर भी चलाए, पैसे भी कमाए और बच्चे को बाप की कमी भी महसूस न होने दे—यह नामुमकिन बोझ है।
'आज़ादी' के नाम पर मर्द को उसकी ज़िम्मेदारी से आज़ाद कर दिया गया और सारा दारोमदार औरत की गर्दन पर डाल दिया गया। बिना बाप के साये के पलने वाले इन बच्चों में भटकाव और इनसिक्योरिटी घर कर जाती है।
हकीकत तो यह है कि औरत का काम करना, जॉब करना पूरी तरह उसका अपना फैसला होना चाहिए, न कोई पाबंदी लगा सकता और न किसी सिस्टम की जबरदस्ती हो सकती। असली आज़ादी यह है कि वह तय करे कि उसे अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी है लेकिन पश्चिम ने तो औरत को महज़ एक 'कमोडिटी' बना दिया है।
उसने औरत को कपड़े उतारने की आज़ादी तो दी, लेकिन बदले में उसे एक 'प्रोडक्ट' बना दिया। आज वहां की इकॉनमी औरतों को विज्ञापनों और फिल्मों में नुमाइश की चीज़ बनाने पर टिकी है। इसे आज़ादी नहीं, 'बाज़ारीकरण' कहते हैं। विज्ञापनों से लेकर सड़कों तक, औरत का जिस्म बेचना वहां की इकॉनमी का हिस्सा है। आप विज्ञापन उठाकर देख लीजिए—परफ्यूम बेचना हो या कंडोम, हर जगह औरत के जिस्म की नुमाइश ज़रूरी है। यह 'आज़ादी' दूर से देखने में बड़ी सुनहरी लगती है, लेकिन जब आप इसकी गहराई में उतरते हैं, तब असलियत मालूम होती है।
एपस्टीन फाइल्स (Epstein Files) जैसी सच्चाइयां इनके समाज का वो घिनौना चेहरा दिखाती हैं, जहाँ औरतों और मासूम बच्चियों का इस्तेमाल सत्ता के गलियारों में कैसे किया गया। इन्होंने औरत के जिस्म को इतना सस्ता कर दिया है कि कभी इन्हें छोटी बच्चियां चाहिए तो कभी मर्द; इनकी हवस की कोई सीमा नहीं है।
और यही लोग आज हमें औरतों की आज़ादी का पाठ पढ़ा रहे हैं? जो वेस्ट ईरान में एक 'हिजाब' पर छाती पीटता है, उसे ग़ज़ा की वो हज़ारों औरतें और बच्चे नज़र नहीं आते जिन्हें उन्हीं के हथियारों ने मलबे में दफ़न कर दिया? जब ईरान के स्कूलों पर हमला हुआ और मासूम बच्चियाँ मारी गईं, तब इनका 'फेमिनिज्म' कहाँ सोया था? असल में, इनके लिए औरत का इख्तियार उसका हक़ सिर्फ़ एक 'हथियार' है, जिसे ये तब इस्तेमाल करते हैं जब इन्हें किसी मुल्क का निज़ाम बदलना हो। हमें भी 'मुल्लाओं के इस्लाम' और 'अल्लाह के असली इस्लाम' में फर्क करना होगा।
मुल्लावाद और वेस्टर्न प्रोपेगेंडा' का गठजोड़ रहा, जिसने दुनिया को यकीन दिला दिया कि इस्लाम औरतों को पीछे रखता है। इस्लाम की रूह कभी तालीम के खिलाफ नहीं रही। जब नबी-ए-करीम (S.A.W) ने फ़रमाया कि "इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फर्ज़ है", तो उसमें मर्द या औरत की कोई तमीज़ नहीं थी। इल्म के लिए चीन जाने की बात में औरतों को बाहर नहीं रखा गया था।
पश्चिमी मीडिया हमें जो 'दमन' की कहानी बेचता है, उसे ईरान के आंकड़े खुद झुठलाते हैं, जहाँ यूनिवर्सिटी जाने वाली महिलाओं की तादाद कई 'आज़ाद' मुल्कों से ज़्यादा है। वहां के अस्पतालों में महिला डॉक्टर, इंजीनियरिंग में महिला साइंटिस्ट्स और फिल्म इंडस्ट्री में महिला डायरेक्टर्स की बड़ी भागीदारी है।
यह है वो हक़ीक़त जिसे 'कट्टरपंथ' के शोर में दबा दिया जाता है। अमेरिका और इज़राइल की 'बदमाशी' सिर्फ सरहदों तक महदूद नहीं, बल्कि उनके खोखले 'लिबरल' नकाब के पीछे भी है। औरतों के अधिकारों की बात वो करें जिनका दामन बेगुनाह औरतों के ख़ून से न रंगा हो।
आज़ादी का पैमाना सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि तालीम, तहाफ्फ़ुज़ और रिस्पेक्ट होना चाहिए।
आज़ादी का मतलब अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी और अपने बच्चों की तरबियत करने का हक़ है, न कि 'इक्वालिटी' के नाम पर अजनबियों के हवाले अपनी नस्लें कर देना।
Hafsa Siddiqui
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