मेलोनी मुस्कुराई, AIMIM तिलमिलाई! बाबा पेट्रोल पंप पर “मेलोडी कांड”
मोदी जी को हंसने भी नहीं दोगे क्या...?
देश में बेरोज़गारी हो, महंगाई हो, पेट्रोल सौ के पार हो, युवा लाइन में खड़े हों, किसान परेशान हों — ये सब अपनी जगह… मगर क्या इस देश के प्रधानमंत्री को दो पल मुस्कुराने का भी अधिकार नहीं है?
क्या नरेंद्र मोदी जी इंसान नहीं हैं? क्या उन्हें अपने किसी “विशेष मित्र” के साथ थोड़ा हंसने-बोलने का भी हक़ नहीं?
लेकिन नहीं… छत्रपती संभाजीनगर ( औरंगाबाद ) की राजनीति में कुछ लोगों को मोदी जी की मुस्कान से भी एलर्जी हो गई है।
AIMIM के नगरसेवक, विपक्ष नेता समीर साजेद बिल्डर की अगुवाई में, दोपहर के वक्त बाबा पेट्रोल पंप पर ऐसे टूट पड़े मानो वहां तेल नहीं, लोकतंत्र बिक रहा हो!
घोषणाबाज़ी शुरू… और फिर जनता में “मेलोडी” चॉकलेट बांटना शुरू!
अरे भाई, इतनी जलन भी अच्छी नहीं होती!
एक व्यक्ति… जो सुबह से शाम तक देश संभालते-संभालते थक गया हो…
जो विदेशी पत्रकारों के तीखे सवालों से बचते-बचाते आखिरकार कुछ पल सुकून के निकाल पाया हो…
जो अपने खास मित्र के साथ हल्की-फुल्की हंसी साझा करना चाहता हो…
उसकी मुस्कान भी अब विपक्ष को चुभने लगी?
और फिर आरोप क्या?
“मोदी जी युवाओं का मज़ाक उड़ा रहे हैं!”
वाह!
अगर कोई युवा सुबह 11 बजे उठकर इंस्टाग्राम रील में “सिस्टम खराब है” बोलते हुए दिन गुजार दे, तो उसमें मोदी जी का क्या दोष?
अगर कोई “वर्क फ्रॉम बेड” को रोजगार नीति समझ बैठे, तो उसका ठीकरा भी मोदी जी के सिर?
मोदी जी ने तो पहले ही बता दिया था —
“ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा!”
अब जनता ने थाली खाली रख ली, तो उसमें बेचारे मोदी जी क्या करें?
उन्होंने तो थाली बजाने तक की ट्रेनिंग दे दी थी!
और देखिए सादगी…
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री हैं।
चाहते तो करोड़ों का गिफ्ट दे सकते थे।
लेकिन दिल इतना सरल कि दोस्ती निभाने के लिए “मेलोडी” चॉकलेट का पैकेट ही काफी समझा!
सच बताइए…
मेलोनी जी के चेहरे की खुशी देखी थी आपने?
या फिर आपको सिर्फ मोदी जी की हंसी से ही तकलीफ हुई?
हम तो AIMIM के जलन विभाग को मुफ्त की सलाह देंगे —
मोदी जी से जलना छोड़िए…
अपने वार्ड की टूटी सड़क, बंद नाली और पानी की लाइन पर भी थोडा ध्यान धर लीजिए ।
मोदी जी ने देश के लिए घर-परिवार छोड़ दिया…
आपसे कोई सन्यास नहीं मांग रहे…
बस इतनी उम्मीद है कि किसी की दोस्ती देखकर पेट में मरोड़ ना उठे।
और समीर साजेद साहब…
बचपन में “मेलोडी” तो खाई ही होगी?
एक बार फिर खाइए…
शायद दिल की कड़वाहट थोड़ी कम हो जाए।
क्योंकि आख़िर में सवाल वही है —
“मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है…?”
क्या कहा…?
चॉकलेट बांटने के लिए कोई “विशेष मित्र” नहीं है?
“लवळ्यम भोज्यम”…!
अली रज़ा आबेदी
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