हजारों करोड़ के ई-फार्मेसी कारोबार पर घमासान, मेडिकल स्टोर संचालकों का विरोध तेज
( सिटिज़न सारांश ) भारत में तेजी से फैल रहे ऑनलाइन मेडिसिन कारोबार ने अब पारंपरिक मेडिकल स्टोर व्यवसायियों और डिजिटल कंपनियों के बीच टकराव का रूप ले लिया है। मोबाइल एप और वेबसाइटों के जरिए घर बैठे दवा मंगाने की सुविधा ने जहां ई-फार्मेसी बाजार को हजारों करोड़ रुपये के उद्योग में बदल दिया है, वहीं देशभर के मेडिकल स्टोर संचालकों का आरोप है कि इस कारोबार की आड़ में नियमों की खुली अनदेखी हो रही है। उनका कहना है कि बिना पर्याप्त जांच के डॉक्टरों की पर्चियां स्वीकार की जा रही हैं और कई मामलों में प्रतिबंधित दवाएं भी सीधे उपभोक्ताओं के घर तक पहुंचाई जा रही हैं। इसी मुद्दे को लेकर 20 मई 2026 को देशभर में कई राज्यों में मेडिकल स्टोर बंद रखे गए। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में प्रशासन ने आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए हेल्पलाइन और वैकल्पिक व्यवस्था शुरू की है!
देश में ऑनलाइन दवा बाजार का आकार अब लगभग 30 से 35 हजार करोड़ रुपये के बीच माना जा रहा है। कोविड महामारी के बाद इस क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई और महानगरों में इसकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार महाराष्ट्र अकेले राष्ट्रीय ई-फार्मेसी कारोबार में लगभग पांचवें हिस्से के बराबर योगदान दे रहा है। मुंबई, पुणे, नागपुर ठाणे और छत्रपती संभाजीनगर ( औरंगाबाद) जैसे शहर ऑनलाइन दवा वितरण के बड़े केंद्र बन चुके हैं, जहां बड़ी कंपनियां भारी छूट और त्वरित होम डिलीवरी के जरिए बाजार पर कब्जा बढ़ा रही हैं।
इसी बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अब देशभर के पारंपरिक मेडिकल स्टोर संचालक खुलकर मैदान में उतर आए हैं। ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स सहित कई व्यापारी संगठनों का आरोप है कि स्थानीय मेडिकल स्टोरों को जहां लाइसेंस, फार्मासिस्ट, निरीक्षण और रिकॉर्ड संबंधी कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है, वहीं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कथित तौर पर इन नियमों से बच निकलते हैं। उनका कहना है कि भारी डिस्काउंट नीति ने छोटे मेडिकल स्टोरों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है और लाखों लोगों के रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है।
सबसे गंभीर आरोप प्रतिबंधित और नियंत्रित दवाओं की बिक्री को लेकर लगाए जा रहे हैं। मेडिकल स्टोर संगठनों का दावा है कि कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर केवल पर्ची की फोटो अपलोड कर दवाएं मंगाई जा सकती हैं और कई मामलों में प्रिस्क्रिप्शन की वास्तविकता की जांच तक नहीं होती। व्यापारियों के अनुसार एंटीबायोटिक, नशीली और साइकोट्रॉपिक श्रेणी की दवाओं की आसान उपलब्धता भविष्य में गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकती है। उन्होंने केंद्र सरकार को भेजे ज्ञापनों में चेतावनी दी है कि यदि इस क्षेत्र पर सख्त नियंत्रण नहीं लगाया गया तो नकली दवाओं, दवा दुरुपयोग और नशे के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है।
दूसरी ओर शहरी उपभोक्ताओं का एक बड़ा वर्ग ऑनलाइन दवा सेवाओं को सुविधाजनक और किफायती मानता है। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर दवाएं अपेाकृत कम कीमत पर मिलती हैं और बुजुर्गों तथा गंभीर मरीजों को घर बैठे दवा उपलब्ध हो जाती है। लेकिन इसी सुविधा के बीच यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि क्या दवा जैसी संवेदनशील वस्तु को सामान्य ई-कॉमर्स मॉडल की तरह पूरी तरह डिजिटल बाजार के भरोसे छोड़ा जा सकता है।
सरकार और नियामक एजेंसियां अब इस पूरे क्षेत्र के लिए सख्त नियमों और निगरानी व्यवस्था पर विचार कर रही हैं, क्योंकि ऑनलाइन मेडिसिन कारोबार का यह विस्तार केवल व्यापार का मामला नहीं रह गया है बल्कि सीधे देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और दवा सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
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