वराह पर सब्सिडी, गाय सड़कों पर नीति का कैसा न्याय...?
भारत में नीतियाँ अब सिद्धांतों से कम और सुविधाओं से ज़्यादा चलती दिखती हैं। एक ओर भगवान विष्णु का वराह अवतार है, जिन्हें धर्मग्रंथों में पृथ्वी का उद्धार करने वाला बताया गया, वरहा को आम ज़बान मे सुअर कहा जाता है!और दूसरी ओर वही वराह ( सुअर ) आज सरकारी योजनाओं में “तेज़ मुनाफ़ा देने वाला मॉडल” बन चुका है। लगता है आस्था का भी अब एक “रेट कार्ड” तय हो गया है—जहाँ फायदा दिखा, वहाँ श्रद्धा थोड़ी ढीली कर दी गई।
महाराष्ट्र मे भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व वादी फडणवीस सरकार ने वराह (सुअर ) पालन योजना को जिस उत्साह से पेश किया उसमें रोज़गार, विकास और आत्मनिर्भरता के इतने रंग भरे गए कि असली सवाल पीछे छूट गए । क्या भगवान विष्णु के पृथ्वी रक्षक अवतार की मांस बिक्री को सरकार ग्रामीण रोजगार के नाम पर प्रोत्साहित करेगी ? क्या इसे महाराष्ट्र के एक नये नवेले हिंदु धर्म रक्षक मंत्री नितेश राणे के मुसलमान और सुअर को लेकर हाल हि मे दिए बयान से प्रभावित होकर सरकार का लिया गया फ़ैसला माना जाए ? इसे युवाओं की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का ज़रिया सरकार बता रही है! बात सुनने में बिल्कुल ठीक लगती है, लेकिन शायद अब यह भी तय हो चुका है कि “अवतार” भी तभी तक पूजनीय है, जब तक वह अर्थव्यवस्था के रास्ते में खड़ा न हो। जैसे ही मुनाफ़ा दिखा, श्रद्धा ने रास्ता बदल लिया।
अगर यही तर्क है, तो फिर गाय पर यह लागू क्यों नहीं होता? काऊ बेल्ट की सच्चाई किसी सरकारी प्रेस नोट से नहीं छुपती। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के खेतों में घूमती गायें और सांड यह बता रहे हैं कि “ गौ माता” का सम्मान कागज़ों तक सीमित है। किसान रात भर खेतों की रखवाली कर रहा है, फसल बचाने के लिए जूझ रहा है, लेकिन नीति उसे यह समझा रही है कि यह सब “संस्कृति की रक्षा” का हिस्सा है। यानी एक तरफ कानून है, दूसरी तरफ लाचार हकीकत—और दोनों के बीच किसान पिस रहा है।
यहाँ आकर सरकार की नीति किसी सिद्धांत से नहीं, बल्कि एक अजीब से गणित से चलती दिखती है। जहाँ आर्थिक लाभ साफ़ दिखता है, वहाँ व्यवहारिकता का झंडा उठा लिया जाता है। और जहाँ भावना का सवाल आता है, वहाँ अचानक कठोरता और पवित्रता की बातें शुरू हो जाती हैं। नतीजा यह कि एक ही देश में दो अलग-अलग सच एक साथ जी रहे हैं—एक सच जो भाषणों में है, और दूसरा जो सड़कों और खेतों में बिखरा पड़ा है।
वराह ( सुअर ) अब अवतार भी है और व्यापार भी, जबकि गाय माता भी है और कई जगहों पर “अवांछित बोझ” भी। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि नीति की वह सुविधा है जिसमें हर बार तराज़ू के बाट बदल दिए जाते हैं। सत्ता के लिए यह शायद एक व्यावहारिक संतुलन हो, लेकिन आम आदमी के लिए यह सीधा सवाल बन जाता है—आख़िर असली सिद्धांत क्या है?
और फिर इस पूरी कहानी में एक और परत जुड़ जाती है। वराह ( सुअर ) पालन को लेकर उठती फुसफुसाहटें यह संकेत देती हैं कि मामला सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। अर्थव्यवस्था के तराजु पर सरकार की यह योजना उतनी फ़ायदेमंद साबित होती भी नही दिखाई देती है, इसकी सबसे बडी वजह ये है देश की बडी आबादी शाकाहारी है! उपर से वरहा (सुअर भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र मे वरहा ( सुअर ) को कभी गांव मे नहीं रखा गया उसे गांव से बहार ही जगह दी गई!ऐसे मे कौनसा सच्चा धार्मिक हिंदु गांव मे उसके पालन, हत्या और मांस की बिक्री का समर्थन करेगा ! मुसलमानो के यहां वरहा ( सुअर )को हराम जानवर कहा गया है! वे उसे खाना तो दुर छुना देखना भी पसंद नहीं करते! शरई पाबंदी के अलावा आजका अधुनिक मेडिकल सायन्स भी वरह ( सुअर ) के मास से होने वाले गंभीर रोगो की पृष्टी करता है!बस यही सब कारण है कि वरह ( सुअर ) पलन और उस से मिलने वाले रोज़गार आर्थिक लाभ की सरकार की मंशा पर सवाल उठने लगे है! सामाजिक संदेश भी जा रहा है, कहीं यह पहचान की राजनीति का हिस्सा तो नही है। मुसलमानो को अलग-थलग डालने या उन्हे चिढाने के लिए सुअर पाले जाने की पोस्ट से सोशल मिडीया भरा पडा है! सरकार इसे नज़रअंदाज़ कर सकती है, लेकिन ज़मीन पर यह सवाल हवा में तैरते रहते हैं।
आख़िर में तस्वीर कुछ ऐसी बनती है कि व्यंग्य खुद ही शब्द खोज लेता है। अवतार अब बाजार में है, माता आवारा होकर सड़कों पर है, किसान परेशान है और सरकार हर नई योजना को विकास का नया अध्याय बता रही है। ऐसे में यह पूछना ग़लत नहीं लगता कि क्या नीतियाँ किसी स्थायी सोच पर टिकती हैं, या फिर हर बार हालात के हिसाब और राजनीतिक नफे नुक्सान से उनका मतलब बदल दिया जाता है।
शायद यही इस दौर का सबसे कड़वा सच है—यहाँ आस्था भी स्थिर नहीं रही, वह भी अब नीति की तरह “एडजस्टेबल” हो गई है।
अली रज़ा आबेदी
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