संभाजीनगर में पानी संकट पर आंदोलन या नौसिखियों का राजनीतिक रिहर्सल ? तुम हमे सत्ता दो हम तुम्हे पानी देंगे ... ?
छत्रपती संभाजीनगर की जनता इन दिनों पानी के लिए जिस तरह दर-दर भटक रही है, उसे देखकर लगता है मानो शहर नहीं, कोई सूखाग्रस्त इलाक़ा हो। नलों में पानी कम और वादों में बहाव ज़्यादा है। ऐसे में महानगरपालिका प्रशासन की सुस्ती तोड़ने और जनता के ग़ुस्से को आवाज़ देने के लिए इ.स.ला.म. पार्टी ने बड़े शोर-शराबे के साथ “हंडा मोर्चा” निकालने का ऐलान किया। सोशल मीडिया पर माहौल ऐसा बनाया गया मानो शहर में कोई ऐतिहासिक आंदोलन जन्म लेने वाला हो। लोगों को उम्मीद थी कि पानी के सवाल पर यह मोर्चा प्रशासन की नींद उड़ा देगा।
लेकिन अफ़सोस, जो मोर्चा प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने निकला था, वह खुद अपनी अव्यवस्था और नौसिखिएपन के कटघरे में खड़ा दिखाई दिया। शहर की महिलाएं खाली हंडे लेकर चिलचिलाती धूप में पहुंचीं। उनके चेहरों पर पानी की पीड़ा थी, लेकिन मोर्चे मे मौजूद नेताओं के चेहरों पर फ़ोटो सेशन की चमक ज़्यादा दिखाई दे रही थी।
यह वही शहर है जिसने कभी स्वर्गीय मोरेश्वर सावे के नेतृत्व में निकला ऐतिहासिक “माठ मोर्चा” देखा था, जिसकी गूंज पूरे महाराष्ट्र में सुनाई दी थी। आज विडंबना देखिए कि उन्हीं के पुत्र अतुल सावे सत्ता में हैं, मंत्री हैं, विधायक हैं, लेकिन शहर की जनता बूंद-बूंद पानी को तरस रही है। यह केवल एक मंत्री की प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस विरासत की भी विफलता है जिसे कभी जनता की लड़ाई का प्रतीक माना जाता था।
इ.स.ला.म. पार्टी के पास सुनहरा मौक़ा था कि वह इसी मुद्दे पर सत्ता को घेरती, मंत्री महोदय की गैरत को ललकारती और भारतीय जनता पार्टी की महानगरपालिका की सत्ता के विरुद्ध नागरिको मे पनप रहे ग़ुस्से को आंदोलन में तब्दील करती। मगर यहां भी राजनीति गंभीरता से ज़्यादा उत्साह में बहती नज़र आई।
मोर्चा महानगरपालिका पहुंचा तो लगा अब कुछ गरज होगी, कुछ बरसात होगी। मगर नेतागण ज्ञापन लेकर अंदर चले गए और बाहर कार्यकर्ता धीरे-धीरे आसपास की होटलों की ओर कूच करने लगे, मानो पानी आंदोलन नहीं बल्कि पिकनिक पर आए हों। उधर महिलाएं खाली हंडे हाथ में लिए धूप में खड़ी रहीं। टेंट और कुर्सियों का इंतज़ाम तो था, लेकिन जब नेताओं को आयुक्त और महापौर से मुलाक़ात की जल्दी हो, तब कार्यकर्ताओं की तकलीफ़ किसे दिखाई देती है?
सबसे दिलचस्प हिस्सा तो नेताओं के बयान रहे। मीडिया के सामने बड़ी गंभीर मुद्रा में कहा गया — “तुम हमें सत्ता दो, हम तुम्हें पानी देंगे!”
जनाब, चुनाव हो चुके हैं! अब पांच साल तक जनता वोट नहीं, पानी मांग रही है। प्यासे नागरिकों को चुनावी घोषणा नहीं, नलों में पानी चाहिए।
और तो और, मोर्चे के बैनर पर भी “हंडा मोर्चा” की जगह “हांडा मोर्चा” लिख दिया गया। यानी आंदोलन की भाषा भी प्यास से सूख गई थी।
कुल मिलाकर, शहर के सबसे गंभीर सवालों में से एक को जिस परिपक्वता, आक्रोश और रणनीति की ज़रूरत थी, वह कहीं दिखाई नहीं दी। जनता पानी के लिए तड़पती रही और आंदोलन अनुभवहीनता, अतिउत्साह और अव्यवस्था के कारण एक प्रभावशाली जनआंदोलन बनने के बजाय हास्य कार्यक्रम में बदलकर रह गया।
What's Your Reaction?