तुम ND.TV छिन सकते हो,मेरे अंदर की पत्रकारिता नही छिन सकते...सब कुछ खोकर भी नहीं हारा सच, प्रणव रॉय की जंग अभी जारी है
भारत की पत्रकारिता के लंबे सफ़र में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते, बल्कि हर मुश्किल दौर में और साफ़ दिखाई देने लगते हैं। प्रणव रॉय ऐसा ही एक नाम है। सत्तर साल की उम्र में जब ज़्यादातर लोग अपने जीवन की थकान को ओढ़ लेते हैं, तब यह आदमी माइक और मोबाइल उठाकर फिर से मैदान में उतर पड़ा है। यह सिर्फ एक वापसी नहीं है, यह एक ऐलान है कि सच अब भी ज़िंदा है और उसे दबाने की हर कोशिश के बावजूद वह रास्ता ढूंढ ही लेता है।
कभी NDTV सिर्फ एक चैनल नहीं था, वह भरोसे का दूसरा नाम था। दर्शक जानते थे कि यहाँ खबर बिकती नहीं, दिखाई जाती है। लेकिन समय बदला और उसके साथ मीडिया का चरित्र भी बदलने लगा। कॉर्पोरेट ताकतों की पकड़ धीरे-धीरे इतनी मजबूत होती गई कि खबरों की आत्मा ही कैद होने लगी। और अब तो हाल ये है जैसे गिध्द मुर्दा जानवर की लाश को नोच खसोट करते है ठिक उसी तरह गोदी मिडीया के एंकर स्टुडिओ मे बैठे ख़बरो के साथ नोच, खसोट चिर फाड करते दिखाई देते है!जब अडानी के हाथों ND.TV का नियंत्रण जाने लगा, तो इसे एक सामान्य व्यापारिक सौदे की तरह पेश किया गया, लेकिन भीतर ही भीतर बहुत कुछ टूट रहा था। यह सिर्फ हिस्सेदारी का हस्तांतरण नहीं था, यह एक सोच, एक परंपरा और एक साहस का दरकना था।
उस दौर में यह सवाल हवा में तैरता रहा कि क्या यह सब केवल बाजार की ताकतों का खेल है या फिर सत्ता और कॉर्पोरेट के उस नाजायज गठबंधन का नतीजा, जो धीरे-धीरे मीडिया को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। आलोचनाएँ उठीं, इशारे हुए, लेकिन सच यह भी है कि डर का एक साया पूरे माहौल पर छा गया था। जब संस्थान बदलता है तो सिर्फ दफ्तर की दीवारें नहीं बदलतीं, वहां काम करने वालों की आत्मा भी घायल होती है। प्रणव रॉय के लिए यह सिर्फ पेशे का अंत नहीं था, यह उस सपने का बिखरना था जिसे उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी देकर खड़ा किया था।
लेकिन शायद यहीं से असली कहानी शुरू होती है। बहुत लोग इस मोड़ पर चुप्पी ओढ़ लेते, समझौता कर लेते या किनारे बैठ जाते। मगर यह आदमी चुप नहीं बैठा। उसने अपने भीतर बची हुई आग को बुझने नहीं दिया। उसने फिर से शुरुआत की, बिना बड़े स्टूडियो के, बिना भारी भरकम संसाधनों के, सिर्फ एक माइक, एक मोबाइल और सच्चाई पर भरोसे, पत्नी राधिका राॅय के साथ। DeKoder उसी भरोसे का नाम है, जहां खबरों को फिर से समझने और समझाने की कोशिश की जा रही है।
आज जब मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के इशारों पर झुकता हुआ दिखाई देता है, जब कॉर्पोरेट हित खबरों की दिशा तय करने लगते हैं, तब एक सत्तर साल का पत्रकार सड़क पर खड़ा होकर सवाल पूछ रहा है। यह दृश्य सिर्फ भावुक नहीं करता, यह झकझोर देता है। यह याद दिलाता है कि पत्रकारिता कैमरे और स्टूडियो की मोहताज नहीं होती, वह हिम्मत और ईमानदारी की मोहताज होती है।
यह कहानी सिर्फ प्रणव रॉय की नहीं है। यह उस हर आवाज़ की कहानी है जिसे दबाने की कोशिश की जाती है। यह उस हर सच की कहानी है जिसे बार-बार किनारे किया जाता है, लेकिन वह फिर भी लौट आता है। सत्ता और कॉर्पोरेट का यह गठबंधन जितना मजबूत दिखता है, उतना ही भीतर से खोखला भी है, क्योंकि यह डर पर टिका होता है, और सच कभी डर से पैदा नहीं होता।
जब एक बुज़ुर्ग पत्रकार अपने हाथ में माइक लेकर फिर से मैदान में उतरता है, तो वह सिर्फ खबर नहीं करता, वह एक संदेश देता है। यह संदेश है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। यह संदेश है कि सच को जितना दबाओगे, वह उतनी ही ताकत से बाहर आएगा। और यह संदेश उन सबके लिए है जो मान चुके हैं कि अब कुछ बदल नहीं सकता।
विश्लेशको की माने तो प्रणव राॅय का ये जज़्बा जेन झी को भी पसंद आ रहा है!कोई शोर गुल नहीं, चिख़ पुकार नही ख़बरो का सटिक विश्लेषण और जिस बात के लिए मिडीया प्रणव रॉय का लोहा मानती है! चुनावी गणित और परीणामो को आसान ज़बान मे दर्शको तक पहोंचाना! वही काम सोशल मिडीया प्लेटफॉर्म से प्रणव रॉय और राधिका राॅय अपने वही पुराने चिरपरिचित अंदाज मे कर रहे है! आज जब लोग सडक पर प्रणव राॅय को हाथ मे माइक लिए मोबाइल से पत्रकारिता करता देखते है तो उनके मुंह से बरबस यही निकलता है " टायगर अभी ज़िंदा है "
सत्तर साल की उम्र में यह जिद, यह जुनून और यह जज़्बा सिर्फ सलाम के काबिल नहीं है, बल्कि एक आईना है जिसमें हमें खुद को देखना चाहिए। क्योंकि अगर एक आदमी सब कुछ खोकर भी खड़ा हो सकता है, तो शायद सच भी अभी पूरी तरह हारा नहीं है! यही बात बडी आसान ज़बान मे प्रणव रॉय समझा रहे है " तुम ND.TV को ज़बरदस्ती छिन सकते हो, लेकिन मेरे भितर के पत्रकार को ना तो छिन सकते हो और नाही मार सकते हो " इसके लिए मुझे आलीशान स्टुडिओ, बडे तामझाम की ज़रूरत नहीं है! बस एक माइक, मोबाइल और मेरे ज़मीर का ज़िंदा रहेना ही काफ़ी है!
अली रज़ा आबेदी
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