गौरव आर्या की टिवी स्टुडिओ मे जुबान से जंग: क्या यही नई ‘देशभक्ति’ है...?
टीवी स्टूडियो में युद्ध का तमाशा: क्या यही “राष्ट्रवाद” है?
टीवी कैमरों के सामने बैठकर जब गौरव आर्या जैसे लोग कहते हैं—
“इज़राइल मेरा सगा भाई है… लेबनान पर सौ बम गिराओ, गाज़ा पर पचास बम गिराओ…” बला... बला...बला...
तो यह सिर्फ एक बयान नहीं रहता, यह एक ख़तरनाक सोच का सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है।
यह कैसी भाषा है? यह कैसा राष्ट्रवाद है, जिसमें इंसानी ज़िंदगियों को गिनती के आंकड़ों में बदल दिया जाता है—“सौ बम”, “पचास बम”? क्या युद्ध अब स्टूडियो की बहसों में बैठकर खेलने का खेल हो गया है?
लेबनान, ग़ाज़ा पहले से ही संघर्ष और तबाही झेल रहे इलाके हैं। वहाँ के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में खुलेआम बमबारी की वकालत करना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह इंसानियत के बुनियादी मूल्यों के खिलाफ भी है।
और जब इस पर कौन्सलेट जनरल इरान हैद्राबाद को हस्तक्षेप करना पड़ता है, तो यह साफ संकेत है कि मामला अब “घरेलू बहस” की सीमा पार कर चुका है। यह सीधे-सीधे कूटनीतिक संवेदनशीलता को चोट पहुँचाने वाला मामला बन गया है। एक ऐसा व्यक्ति जिस पर सोशल मिडिया पर कारगिल युद्ध से भागने के आरोप लगते रहे है! इन आरोपो मे कितनी सच्चाई है ये हम नही जानते है!और नाही इस बहेस मे पडना चहाते है! कारगिल युद्ध के सभी योध्दाओं को हम दिल से सलाम करते है! साथ ही साथ गौरव आर्या जैसी मानसिकता रखने वाले लोगो की हम तिखी भ्रत्सना भी करते है! हम नही चहाते राष्ट्रवाद के नाम पर कोई टिवी चैनल की फ़ालतु डिबेट मे बैठ कर उल जलुल बकवास करे और उसका असर हमारे देश की कुटनिती पर पडे जिसका ख़ामियाज़ा देश को भुगतना पडे! हमारी भारत सरकार से गुज़ारिश है! गौरव आर्या और उनकी जैसी मानसिकता रखने वाले लोगो पर लगाम लगाए!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टीवी डिबेट अब सिर्फ शोर, उकसावे और चरम बयानबाज़ी का मंच बन चुकी हैं? जहाँ जो जितना ज़्यादा भड़काऊ बोलेगा, वही “देशभक्त” कहलाएगा?
कारगिल वाॅर जैसे युद्धों में लड़ने वाले सैनिकों का असली चेहरा यह नहीं होता। वे युद्ध की कीमत जानते हैं—खून, दर्द और अपनों की खोई हुई ज़िंदगियाँ। लेकिन स्टूडियो में बैठकर युद्ध के नारे लगाने वाले लोग उस कीमत को सिर्फ शब्दों में बदल देते हैं।
यह सिर्फ एक बयान नहीं है—यह उस गिरते हुए स्तर की निशानी है, जहाँ तर्क की जगह उन्माद और जिम्मेदारी की जगह उकसावा ले रहा है।
अगर यही “नई बहस” है, तो यह बहस नहीं—एक खतरनाक तमाशा है।
अली रज़ा आबेदी
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