इरान से जंग के लिए तैनात अमेरिकन युद्ध पोत पर टाॅयलेट एमरजेंसी : जंग सिर्फ हथियारों से नहीं, सेहत से भी जीती-हारी जाती है
विशेष लेख | अली रज़ा आबेदी
जंग का नाम आते ही दिमाग में टैंक, तोप और बहादुरी की तस्वीर बनती है। लेकिन जब पुराने रिकॉर्ड और इतिहास की किताबें थोड़ा गौर से पढ़ी जाती हैं, तो एक अलग ही हकीकत सामने आती है—कई बार जंग का रुख तलवार या गोली से नहीं, बल्कि बीमारियों और सेहत की परेशानियों से बदल गया।
हाल के दिनों में आधुनिक दौर की अमेरिकन नौसैनिक बेडे पर ठिक युद्ध से पहेले उपजी टाॅयलेट एमरजेंसी की चर्चा ने लोगों को इस पहलू की याद दिला दी। कहा जा रहा है ड्रेनेज चोकप के कारण युध्द पोत पर तैनात सैनिक दुष्मन से भिडने से पहेले आपस मे ही लढने लगे है! ख़बरे तो यहां तक है, इरान युध्द से घबराए सैनिको ने ही युध्द पोत पर ड्रेनेज चोकप की समस्या खडी की है! हम यहाँ उस घटना की बात नहीं, बल्कि उस बहाने इतिहास के उस हिस्से को समझाना हमारा मकसद है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जब बड़ी फौज और छोटा सा स्वास्थ्य संकट टकरा जाए
Napoleonic Wars के दौर में Napoleon Bonaparte का नाम ही काफी था—रणनीति तेज, फैसले सख्त और जीत का सिलसिला लंबा।
लेकिन इतिहासकार लिखते हैं कि कुछ मौकों पर उनकी सेहत ने फैसलों की रफ्तार को प्रभावित किया। जंग में कभी-कभी थोड़ी सी देरी भी बहुत बड़ी साबित हो जाती है।
यानी नक्शे पर बनी योजना और मैदान में लागू हकीकत—दोनों के बीच इंसानी शरीर खड़ा रहता है।
अमेरिकी गृहयुद्ध: जहाँ बीमारी पहले पहुंची, गोलियाँ बाद में
American Civil War के दौरान सैनिक कैंपों की हालत बहुत अच्छी नहीं थी।
साफ पानी की कमी, गंदगी और लंबा ठहराव—इन सबने दस्त, पेचिश और टाइफाइड जैसी बीमारियों को तेजी से फैलाया।
हालात ऐसे हुए कि कई सैनिक लड़ाई से पहले ही कमजोर पड़ गए। जंग मैदान में थी, मगर असर कैंप से शुरू हो चुका था।
जब वायरस ने मोर्चा पार कर लिया
World War I में दुनिया की सबसे बड़ी सेनाएँ आमने-सामने थीं।
लेकिन 1918 की महामारी ने यह दिखा दिया कि बीमारी किसी सरहद को नहीं मानती।
सैनिक खाइयों में थे और अस्पताल भरे जा रहे थे—दोनों मोर्चे साथ चल रहे थे।
तकनीक आई, मगर चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई
World War II तक आते-आते दवाइयों और मेडिकल सिस्टम में काफी सुधार हो चुका था।
एंटीबायोटिक दवाओं ने संक्रमण कम किए, लेकिन अलग-अलग इलाकों की जलवायु और स्थानीय बीमारियाँ अब भी चुनौती बनी रहीं।
जंग की असली तैयारी क्या है?
इतिहास का सीधा सा सबक है—
जंग सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जाती, बल्कि इन चीज़ों से भी तय होती है !
साफ़ पानी, सही खाना,टाॅयलेट का सही इंतज़ाम और बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधा
इनमें कमी हो तो बड़ी से बड़ी फौज भी कमजोर पड़ सकती है।
आज अमेरिका और दुनिया के पास ड्रोन हैं, सैटेलाइट हैं, डिजिटल कमांड सिस्टम हैं।
लेकिन सैनिक अब भी इंसान ही है—उसे वही खाना चाहिए, साफ़ सुथरा टाॅयलेट और वही आराम चाहिये
इतिहास जैसे मुस्कुराकर कहता है!
तकनीक कितनी भी तेज हो जाए, इंसानी जिस्म अभी भी अपनी ही रफ्तार से चलता है।
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