जयंती पर याद करने भर से नहीं होगा—डॉ. आंबेडकर के अधूरे सपनों से सामना भी जरूरी

Apr 14, 2026 - 09:12
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जयंती पर याद करने भर से नहीं होगा—डॉ. आंबेडकर के अधूरे सपनों से सामना भी जरूरी

हर साल 14 अप्रैल को देशभर में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जयंती पूरे सम्मान और उत्साह के साथ मनाई जाती है। सरकारी समारोहों से लेकर चौक-चौराहों तक, हर जगह डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उन्हें सिर्फ एक “संविधान निर्माता” के रूप में सीमित कर रहे हैं, या उनके जीवन के उन पहलुओं को भी समझ रहे हैं, जो आज के समाज के लिए सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं?

डॉ. आंबेडकर का जीवन केवल उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि उस पीड़ा और संघर्ष का दस्तावेज़ है, जिसे उन्होंने बचपन से ही झेला। स्कूल में अलग बैठने को मजबूर किया जाना, पानी तक छूने की मनाही—ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं थीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का आईना थीं, जिसके खिलाफ उन्होंने आजीवन संघर्ष किया।

विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को कभी पानी तक छूने नहीं दिया गया, उसी ने आगे चलकर देश के करोड़ों लोगों के अधिकारों की प्यास बुझाने वाला संविधान लिखा।

शिक्षा को उन्होंने केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया। कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे संस्थानों में अध्ययन कर उन्होंने यह साबित किया कि प्रतिभा किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती।

उनकी निजी लाइब्रेरी में हजारों किताबों का संग्रह इस बात का प्रमाण है कि वे ज्ञान को सबसे बड़ी शक्ति मानते थे।

डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण, लेकिन कम चर्चित पहलू उनका आर्थिक दृष्टिकोण है। वे मानते थे कि सामाजिक समानता तब तक अधूरी है, जब तक आर्थिक असमानता बनी रहती है। भारत की वित्तीय संरचना को लेकर उनके विचारों का असर भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना तक में देखा जाता है।

इसके अलावा, महिलाओं के अधिकारों के लिए उनकी प्रतिबद्धता उन्हें अपने समय से कहीं आगे का नेता बनाती है। हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को समान अधिकार दिलाने की कोशिश की, लेकिन विरोध इतना तीव्र था कि उन्हें मंत्री पद तक छोड़ना पड़ा। आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि उसकी नींव रखने वालों में आंबेडकर अग्रणी थे।

उनके जीवन का सबसे निर्णायक और प्रतीकात्मक कदम 1956 में बौद्ध धर्म को अपनाना था। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक अन्याय के खिलाफ एक खुला विद्रोह था—एक संदेश कि सम्मान के बिना कोई भी परंपरा स्वीकार्य नहीं हो सकती।

आज, जब देश उनकी जयंती मना रहा है, तब यह जरूरी है कि हम केवल उनके चित्रों पर माल्यार्पण तक सीमित न रहें। उनके विचारों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही गहरी है, जितनी उनके समय में थी।

सवाल यह नहीं है कि हम उन्हें कितना याद करते हैं, बल्कि यह है कि हम उनके दिखाए रास्ते पर कितना चल रहे हैं।

डॉ. आंबेडकर ने चेताया था कि यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता खत्म नहीं हुई, तो लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा। आज की परिस्थितियों में यह चेतावनी और भी अधिक गंभीर लगती है।

 

अली रज़ा आबेदी 

 

 

 

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