छत्रपती संभाजीनगर महानगरपालिका स्वीकृत सदस्य चयन मे " खेला होबे "... स्वीकृत सदस्य या सियासी सेलेक्शन बचेगी कुर्सी या होगी घरवापसी...?
छत्रपति संभाजीनगर में स्वीकृत सदस्यों की नियुक्ति का ताज़ा किस्सा कुछ ऐसा है मानो नियम किताबों में सो रहे हों और सत्ता गलियारों में “योग्यता” की नई परिभाषा लिखी जा रही हो जिस प्रावधान को प्रशासनिक समझ और विशेषज्ञता का सहारा बनना था वही अब सियासी एहसान चुकाने का जरिया बनता दिख रहा है और दिलचस्प यह कि सब कुछ कानून की छाया में होते हुए भी कानून को किनारे बिठाकर किया गया है
मुंबई महानगरपालिका अधिनियम 1949 और महाराष्ट्र महानगरपालिका (नामनिर्देशित सदस्य) नियम 2012 साफ कहते हैं कि अलग अलग क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को जगह दी जाए ताकि शहर को विविध अनुभवों का लाभ मिले मगर यहां तो जैसे एक ही दरवाज़ा खुला और बाकी सब खिड़कियां बंद कर दी गईं दस में से आठ सदस्य एक ही श्रेणी से चुन लिए गए अब इसे संयोग कहें या सुनियोजित “सुविधा” यह पाठक समझदार है
कागज़ों की दुनिया भी कम दिलचस्प नहीं है कहीं संस्था है पर उसकी नियमावली में वही शब्द नहीं जिसके आधार पर सदस्य चुना गया कहीं अनुभव है पर प्रमाण अधूरे हैं और कहीं तो ऐसा भी कि महिला मंडल का सचिव एक पुरुष निकला दस्तावेज़ों का यह जादू देख कर लगता है कि प्रशासनिक प्रक्रिया कम और कोई रचनात्मक लेखन प्रतियोगिता ज्यादा चल रही थी
समयसीमा की कहानी भी कम रंगीन नहीं है नियम कहते हैं कि पहली ही बैठक में यह चयन हो जाना चाहिए मगर यहां वक्त भी शायद किसी सियासी कैलेंडर से चलता है देर से हुआ तो क्या हुआ आखिर “ज़रूरत” पूरी होनी चाहिए और जब ज़रूरत सत्ता की हो तो नियम अक्सर शिष्टाचार निभाते हुए चुप ही रहते हैं
राजनीतिक हिस्सेदारी का गणित भी खुली किताब है किसी ने अपने पांच के पांच नाम एक ही खांचे में फिट कर दिए तो किसी ने तीन में से दो वहीं डाल दिए जहां पहले से भीड़ लगी थी विशेषज्ञता की थाली में एक ही पकवान बार बार परोसा गया और बाकी व्यंजन सिर्फ मेन्यू में ही रह गए
सबसे मज़ेदार बात यह कि जिन संस्थाओं के नाम पर यह पूरा खेल खड़ा किया गया उनकी अपनी कागजी पहचान ही सवालों में है यानी इमारत खड़ी है मगर नींव का पता नहीं अब ऐसे में अगर कोई पूछ ले कि यह चयन है या चयन का अभिनय तो जवाब शायद खामोशी में ही मिलेगा
आखिर में वही पुराना जुमला गूंजता है कि हम करें सो कायदा यहां प्रशासन ने आयुक्त की साख को दांव पर लगाया और नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को सियासी इनाम दे दिया जनता के हिस्से आया सिर्फ यह तमाशा कि कानून मौजूद है मगर लागू कब होगा यह अभी तय होना बाकी है
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