चालीस दिन, ख़ैबर की याद और मौजूदा जंग का आईना
तारीख़े इस्लाम में “चालीस दिन” की अहमियत सिर्फ़ एक संख्या भर नहीं, बल्कि सब्र, इम्तिहान और फ़तेह के एक मुकम्मल दौर की निशानी रही है। ख़ास तौर पर शिया मसलक में यह अवधारणा और भी गहराई रखती है। जंग-ए-ख़ैबर का वाक़िया इसका एक अहम उदाहरण है—एक ऐसी जंग, जो लंबी कशमकश के बाद आखिरकार फ़तेह में तब्दील हुई।
रिवायतों के मुताबिक़, 39 दिनों की जद्दोजहद के बाद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.स.ने ऐलान किया कि “कल मैं अलम उसे दूंगा जो कर्रार होगा, ग़ैरे फ़र्रार होगा”—यानी ऐसा सिपहसालार जो बहादुर हो, डटकर मुकाबला करे और मैदान से पीछे न हटे। अगले दिन यह ज़िम्मेदारी हज़रत अली को सौंपी गई, और इसके साथ ही जंग का रुख़ बदल गया। यह सिर्फ़ एक फ़ौजी जीत नहीं थी, बल्कि इरादे, यक़ीन और क़ियादत की ताक़त का प्रतीक बन गई।
इतिहास अक्सर अपने आपको दोहराने की बात करता है, और मौजूदा दौर में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव ने इस तुलना को एक नई बहस का विषय बना दिया है। हालिया घटनाक्रमों में जिस तरह आम नागरिक—बुज़ुर्ग, महिलाएं और नौजवान—सड़कों पर उतरे, उसने सामूहिक जज़्बे और प्रतिरोध की एक झलक पेश की। इस तरह की सामाजिक लामबंदी किसी भी संघर्ष में मनोवैज्ञानिक बढ़त देती है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
हालांकि, जंग सिर्फ़ जज़्बात या बहादुरी की कहानी नहीं होती—यह अपने साथ भारी आर्थिक और सामाजिक नुक़सान भी लेकर आती है। किसी भी आधुनिक संघर्ष में सबसे पहले चोट अर्थव्यवस्था पर पड़ती है। तेल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार मार्गों में बाधा, निवेशकों का भरोसा डगमगाना—ये सब ऐसे असरात हैं जो सरहदों से बाहर निकलकर पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं। पश्चिम एशिया जैसे रणनीतिक क्षेत्र में तनाव का सीधा असर वैश्विक बाज़ारों, ख़ास तौर पर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता है। इसके अलावा, बुनियादी ढांचे का नुक़सान, आम नागरिकों की ज़िंदगी में अस्थिरता और मानवीय संकट—ये जंग के ऐसे पहलू हैं जो अक्सर सुर्खियों के पीछे छुप जाते हैं।
राजनयिक मोर्चे पर भी तस्वीर कम पेचीदा नहीं है। बैक-चैनल डिप्लोमेसी, अस्थायी सीज़फ़ायर और सार्वजनिक बयानबाज़ी—इन सबके बीच सच्चाई अक्सर परतों में छुपी रहती है। डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेताओं की तीखी बयानबाज़ी और बेंजामिन नेतन्याहु की रणनीतिक चुप्पी, दोनों मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां सूचना और प्रचार के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। “दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए” और “विश्वगुरु” जैसे दावों के बावजूद भारत अपेक्षाकृत शांत नज़र आया। विशेषज्ञों के मुताबिक़, यह एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति भी हो सकती है, जहां संतुलन बनाए रखना प्राथमिकता हो। फिर भी, यह बहस जारी है कि क्या भारत ने इस मौके पर अपनी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष छवि से समझौता किया है या फिर बदलते वैश्विक समीकरणों के मुताबिक़ अपने रुख़ को ढाला है।
हक़ीक़त यही है कि जंग का हासिल अक्सर सीमित और नुक़सान व्यापक होता है। इसके असर दूरगामी होते हैं—सिर्फ़ शामिल देशों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सियासत और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। आज जो सीज़फ़ायर दिखाई दे रहा है, वह स्थायी शांति का संकेत है या महज़ एक अंतराल—यह आने वाला वक़्त तय करेगा।
इतिहास के आईने में देखें तो हर जंग के बाद एक नई दुनिया बनती है, लेकिन उस नई दुनिया की बुनियाद में जो क़ीमत चुकाई जाती है, वह हमेशा बहुत भारी होती है। ऐसे में असली सवाल यही है—क्या इंसानियत ने अब तक इतिहास से कुछ सीखा है, या “चालीस दिन” का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा?
अली रज़ा आबेदी
What's Your Reaction?