डॉलर के बाद की दुनिया : ईरान, क्रिप्टो और जियोपॉलिटिक्स का संगम
मध्य-पूर्व की सियासत को समझने के लिए हमेशा से कुछ तयशुदा लफ़्ज़ इस्तेमाल होते रहे हैं—तेल, परमाणु कार्यक्रम और इलाक़ाई असर-ओ-रसूख। मगर पिछले कुछ बरसों में एक नया पहलू ख़ामोशी से इस बहस में दाख़िल हुआ है—डिजिटल करेंसी, ख़ास तौर पर Bitcoin ( बिटकॉइन ) यह वही दुनिया है जो न सरहदों को मानती है, न पारंपरिक बैंकिंग क़ायदों को, और शायद इसी वजह से आज जियोपॉलिटिक्स के दायरे में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है।
साल 2018 में जब डोनाल्ड ट्रम्प की हुकूमत ने इरान पर सख़्त आर्थिक पाबंदियां लगाईं, तो इसका असर सिर्फ़ काग़ज़ी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। रियाल की क़ीमत गिरती चली गई, तेल की आमदनी पर शिकंजा कस गया और ईरान लगभग उस आलमी बैंकिंग निज़ाम से कट गया, जिस पर दुनिया का कारोबार टिका है। ऐसे में तेहरान के पास रास्ते कम थे, लेकिन इरादे मज़बूत थे। यहीं से एक अलग किस्म की सोच ने जन्म लिया—अगर डॉलर नहीं मिल सकता, तो क्या बिजली को ही डिजिटल दौलत में बदला जा सकता है?
ईरान के पास तेल और गैस के बड़े ज़ख़ीरे हैं, और उसी से पैदा होने वाली सस्ती बिजली। इसी बुनियाद पर एक ऐसा मॉडल खड़ा किया गया, जिसमें ऊर्जा को सीधे क्रिप्टो माइनिंग में लगाया गया। बड़े-बड़े गोदामों में मशीनें दिन-रात चलती रहीं और डिजिटल करेंसी पैदा होती रही—एक ऐसी दौलत, जिसे पारंपरिक बैंकिंग पाबंदियां आसानी से रोक नहीं सकतीं। कुछ अंतरराष्ट्रीय अंदाज़ों के मुताबिक, इस दौर में ईरान की हिस्सेदारी वैश्विक Bitcoin माइनिंग में कुछ 2 से 3 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी। यह हिस्सा भले ही बहुत बड़ा न लगे, लेकिन एक पाबंदियों से जकड़े मुल्क के लिए यह किसी वैकल्पिक सांस की तरह था।
इस पूरे ढांचे को लेकर अक्सर आईआरजीसी का नाम भी चर्चा में आता रहा है। कई रिपोर्ट्स इशारा करती हैं कि इस नेटवर्क के कुछ हिस्सों को सुरक्षा या सहारा हासिल था, हालांकि इन दावों की पूरी तरह आज़ाद तस्दीक़ आसान नहीं है। फिर भी इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि यह महज़ एक कारोबारी तजुर्बा नहीं था, बल्कि इसमें स्ट्रैटेजिक सोच की भी झलक मिलती है—एक ऐसी कोशिश, जिसमें पाबंदियों के बावजूद आर्थिक बहाव बनाए रखा जाए।
लेकिन हर कहानी का एक दूसरा पहलू भी होता है। जहां एक तरफ़ यह डिजिटल मॉडल ईरान को कुछ राहत देता दिखा, वहीं दूसरी तरफ़ आम लोगों की ज़िंदगी पर इसका असर भी सामने आया। कई मौकों पर बिजली की किल्लत की खबरें आईं, घरेलू खपत प्रभावित हुई और यह सवाल उठने लगा कि क्या ऊर्जा का रुख़ अवाम से ज़्यादा इन “सिस्टम्स” की तरफ़ मोड़ा जा रहा है। यह वही जगह है, जहां टेक्नोलॉजी और समाज आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
इधर, अगर हाल के सैन्य और साइबर हमलों के पैटर्न को गौर से देखा जाए, तो एक दिलचस्प रुझान सामने आता है। निशाने पर सिर्फ़ पारंपरिक सैन्य ठिकाने नहीं रहे, बल्कि बिजली के ढांचे, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डेटा नेटवर्क जैसे बुनियादी तंत्र भी आए। यही वो ढांचे हैं, जिन पर डिजिटल अर्थव्यवस्था—ख़ासतौर पर क्रिप्टो माइनिंग—टिकी होती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या ये महज़ इत्तिफ़ाक़ है, या फिर जंग का दायरा अब उन अदृश्य नेटवर्क्स तक फैल चुका है, जिन्हें हम आम तौर पर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
अमेरिका के सियासी मंज़रनामे में भी इस दौरान एक दिलचस्प तब्दीली देखी गई है। डोनाल्ड ट्रम्प जो कभी क्रिप्टोकरेंसी को शक की नज़र से देखते थे, अब डिजिटल एसेट्स के बारे में पहले से कहीं ज़्यादा नरम रुख़ रखते नज़र आए हैं। उनके नाम से जुड़े कुछ डिजिटल प्रोजेक्ट्स और एनएफटी कलेक्शन्स ने अच्छी-ख़ासी कमाई भी की है। मगर यहां एक अहम बात साफ़ रहनी चाहिए—अब तक ऐसा कोई ठोस, क़ाबिल-ए-एतबार सबूत सामने नहीं आया है, जो यह साबित करे कि जियोपॉलिटिकल फैसले या सैन्य कार्रवाइयां सीधे तौर पर इस तरह के मुनाफ़े से जुड़ी हुई हैं।
दरअसल, असली तस्वीर इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी की जड़ें सिर्फ़ एक मुद्दे में नहीं, बल्कि कई तहों में फैली हुई हैं—परमाणु कार्यक्रम, इलाक़ाई सियासत, तेल के रास्ते और अब डिजिटल फाइनेंस का उभरता हुआ किरदार। बिटकॉइन इस पूरी कहानी में एक नया किरदार ज़रूर है, लेकिन पूरी कहानी उसी के इर्द-गिर्द घूमती है, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी।
आज की दुनिया में जंग का मयार बदल रहा है। जहां पहले सरहदें और हथियार ही फ़ैसला करते थे, वहीं अब सर्वर, बिजली और कोड भी उतने ही अहम हो गए हैं। हो सकता है कि आने वाले वक़्त में असली लड़ाई उन नेटवर्क्स पर लड़ी जाए, जिन्हें हम देख नहीं सकते, मगर जिनका असर हर मुल्क, हर बाज़ार और हर इंसान तक पहुंचता है।
अली रज़ा आबेदी
What's Your Reaction?