ईरान पर ट्रंप का आर्थिक शिकंजा : असली चुनौती प्रतिबंध नहीं, उन्हें लागू करना है!
[ अली रज़ा आबेदी ] अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 20 अगस्त को कहा कि अमेरिका ईरान पर “इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध” लगाएगा और सोमवार को उनकी विस्तृत योजना बताई जाएगी। उन्होंने इसे मौजूदा नाकाबंदी के साथ “one-two punch” बताया और कहा कि इसका उद्देश्य ईरानी शासन पर इतना दबाव डालना है कि वह गिर जाए!
अल-जज़ीरा की 21 अगस्त की रिपोर्ट में राजनीतिक विश्लेषक एलेक्स अल्फिर्राज़ शीर्स ने ईरान के खिलाफ ट्रंप प्रशासन की नई प्रतिबंध रणनीति के सामने मौजूद एक अहम चुनौती की ओर ध्यान खींचा है। उनके मुताबिक, अमेरिका की समस्या केवल यह नहीं है कि उसके पास ईरान पर आर्थिक दबाव डालने की क्षमता कितनी है, बल्कि यह भी है कि दुनिया के दूसरे देश अब अमेरिकी धमकियों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की नई मुहिम शुरू करने की चेतावनी दी है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे “इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध” बताया है और कहा है कि अमेरिका उन देशों को भी निशाना बना सकता है जो ईरान को आर्थिक रास्ता उपलब्ध कराते हैं। प्रतिबंधों की विस्तृत योजना 24 अगस्त को सामने आने की बात कही गई है।
यहीं से ट्रंप की नई रणनीति की असली परीक्षा शुरू होती है। अमेरिका अगर केवल ईरानी कंपनियों और संस्थानों पर प्रतिबंध लगाता है तो यह पुरानी नीति का विस्तार होगा। लेकिन अगर वॉशिंगटन ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों, बैंकों, तेल खरीदारों और वित्तीय नेटवर्क को भी secondary sanctions के जरिए निशाना बनाता है, तो मामला कहीं ज्यादा गंभीर हो जाएगा।
सबसे बड़ी चुनौती चीन है। रायटर्स के मुताबिक चीन ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80 प्रतिशत से अधिक खरीदता है। यानी ईरान की आर्थिक जीवनरेखा को वास्तव में काटना है तो अमेरिका को चीन के साथ भी टकराव का जोखिम उठाना पड़ेगा। लेकिन चीन पहले ही कह चुका है कि प्रतिबंध और आर्थिक दबाव समस्या का समाधान नहीं करेंगे।
यही वह बिंदु है जिसे अल-जज़ीरा में एलेक्स अल्फिर्राज़ शीर्स की टिप्पणी के संदर्भ में समझना जरूरी है। यदि अमेरिका दुनिया के हर उस देश और कंपनी को धमकी देता है जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखती है, तो वॉशिंगटन को यह साबित करना होगा कि वह अपनी धमकियों को वास्तव में लागू करने की राजनीतिक और आर्थिक क्षमता रखता है। केवल कड़े बयान देना और उन्हें व्यवहार में लागू करना दो अलग-अलग चीजें हैं।
ट्रंप प्रशासन के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ ईरान की तेल आय, विदेशी मुद्रा और व्यापारिक नेटवर्क पर दबाव बढ़ाना है, वहीं दूसरी तरफ चीन जैसे बड़े आर्थिक साझेदारों के साथ टकराव को नियंत्रित करना है। अमेरिका जितना व्यापक secondary sanctions का इस्तेमाल करेगा, उतना ही यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि दूसरे देश अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए किस हद तक वैकल्पिक रास्ते तलाशते हैं।
इसलिए ट्रंप की नई प्रतिबंध रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं होगी कि वॉशिंगटन कितनी कठोर भाषा इस्तेमाल करता है। असली परीक्षा यह होगी कि अमेरिका अपनी आर्थिक ताकत को कितनी दूर तक लागू कर सकता है और कितने देश उसके साथ खड़े होते हैं। अगर अमेरिका ईरान के आर्थिक नेटवर्क को दबाने के लिए चीन और दूसरे बड़े व्यापारिक साझेदारों पर भी दबाव डालता है, तो यह केवल ईरान के खिलाफ प्रतिबंध अभियान नहीं रहेगा; यह अमेरिकी आर्थिक प्रभाव और उसके सामने उभर रहे वैकल्पिक वैश्विक व्यापार नेटवर्क के बीच भी एक बड़ी परीक्षा बन जाएगा। आने वाले दिनों में घोषित होने वाले नए प्रतिबंध और उनके वास्तविक क्रियान्वयन से इस सवाल का जवाब काफी हद तक सामने आ जाएगा।
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