मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए वन विभाग का अनूठा प्रयोग; दो मादा तेंदुओं को दिया गया गर्भनिरोधक इंजेक्शन
( सिटिज़न सारांश ) मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को रोकने के लिए महाराष्ट्र के वन विभाग ने एक अनूठी पहल की है। पुणे के जुन्नर वन क्षेत्र में दो मादा तेंदुओं को गर्भनिरोधक इंजेक्शन देकर उनकी प्रजनन क्षमता को अस्थायी रूप से नियंत्रित करने का प्रयोग किया गया है। वन विभाग का दावा है कि मानव–वन्यजीव संघर्ष कम करने के उद्देश्य से देश में इस तरह का यह पहला प्रयोग है।
वन विभाग ने यह कदम तेंदुओं की बढ़ती संख्या और आबादी वाले क्षेत्रों में उनके बढ़ते विचरण से उत्पन्न चुनौतियों को देखते हुए उठाया है। इस पहल को वन्यजीव संरक्षण के तहत शुरू की गई एक प्रायोगिक परियोजना का हिस्सा बताया गया है।
वन्यजीवों की प्रजनन दर नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इस तकनीक में गर्भनिरोधक दवा दी जाती है। इससे मादा तेंदुओं की प्रजनन क्षमता कुछ समय के लिए प्रभावित होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस इंजेक्शन का प्रभाव सीमित अवधि तक रहता है और इसके बाद मादा तेंदुए दोबारा प्राकृतिक रूप से प्रजनन कर सकती हैं।
इस प्रयोग के लिए चुनी गई दोनों मादा तेंदुओं को इंजेक्शन देने के बाद उनकी शारीरिक स्थिति और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा। इसके निष्कर्षों के आधार पर भविष्य में इस पद्धति के इस्तेमाल की संभावनाओं का आकलन किया जा सकता है।
यह पहल महाराष्ट्र के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एम. श्रीनिवास रेड्डी, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक तथा संबंधित वन्यजीव अधिकारियों की निगरानी में शुरू की गई है। परियोजना के तहत तेंदुओं की संख्या नियंत्रित करने के साथ-साथ मानव बस्तियों में उनके प्रवेश और उससे पैदा होने वाले संघर्ष को कम करने के उपायों का अध्ययन किया जाएगा।
वन विभाग का मानना है कि मानव बस्तियों के विस्तार, जंगलों में बदलाव और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर बढ़ते दबाव के कारण इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में प्रजनन नियंत्रण की तकनीक एक संभावित विकल्प के रूप में सामने आई है।
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