मुंबई भाजपा अध्यक्ष साटम सटकले : मुंबई का महापौर किसी ख़ान को नही बनने देंगे
मुंबई — सपनों और संघर्षों का शहर, जहां हर गली में किसी की कहानी, किसी की उम्मीद और किसी की आवाज़ गूंजती है। इस शहर की राजनीति में एक नाम अक्सर चर्चा में रहता है — अमित भास्कर साटम। तीन बार विधायक चुने जाने के बाद, हाल ही में भाजपा मुंबई अध्यक्ष बने, साटम की छवि एक सक्रिय और संगठन-प्रधान नेता की है।
लेकिन हालिया बयान —
“मुंबई का महापौर किसी खान को नहीं बनने देंगे।”
ने शहर में हलचल मचा दी और लोगों के जज़्बातों को झकझोर दिया।
एक नेता और इंसान
साटम का सफर सामान्य परिवार से शुरू हुआ। उन्होंने शिक्षा और प्रबंधन में दक्षता हासिल की और राजनीति में कदम रखते ही यह समझा कि सत्ता सिर्फ पद और शक्ति नहीं, बल्कि लोगों की आशाओं, उनके दुखों और उनके छोटे-छोटे संघर्षों को समझने का जरिया है।
विधानसभा में उन्होंने पुलों की मरम्मत, ट्रैफिक सुधार, नागरिक सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम किया। उनके समर्थक उन्हें “सिटी का सच्चा काम करने वाला नेता” मानते हैं। लेकिन यह बयान उनकी छवि में तीव्रता और विवाद भी जोड़ गया।
बयान और उसके जज़्बात
मुंबई एक बहुसांस्कृतिक शहर है, जहां हर व्यक्ति की पहचान मायने रखती है। साटम का बयान कई लोगों के लिए सुरक्षा और पहचान का संकेत हो सकता है, वहीं कई लोगों के लिए यह ध्रुवीकरण और असहिष्णुता की चिंता पैदा करता है।
इस बयान ने यह भी याद दिलाया कि राजनीति सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि इंसानियत, संवेदनाएँ और समुदायों की भावनाएँ भी उसके केंद्र में होनी चाहिए।
सामाजिक असर
समर्थक इसे नेतृत्व और सुरक्षा की प्रतिबद्धता के रूप में देखते हैं।
आलोचक इसे शहर की विविधता और सामाजिक समरसता पर चुनौती मानते हैं। न्यूयॉर्क मे ज़ोहरान ममदानी की जबरदस्त जित ने धार्मिक बुनियद पर कट्टरवाद की राजनीति करने वालो की बुनुयादो को हिलाकर रख दिया है, मुंबई मे महानगरपालिका चुनाव की बयार बहेने लगी है, साटम का हालिया बयान अपने पारंपारिक मतदाताओ को साधने की नज़र से भी देखा जा रहा है!
मानव दृष्टि से, शहर के हर नागरिक की आसमान-सी महत्वाकांक्षा और जीवन की भावनाएँ राजनीतिक फैसलों में नजर आनी चाहिए। जाती, धर्म की बैसाखियो पर राजनिती करने वाले नेतओ की मजबुरी बनजाती है, ऐसी ज़हेरीली भाषा का इस्तेमाल करना!
अमित साटम की यात्रा हमें यह दिखाती है कि नेतृत्व में साहस और संवेदनशीलता साथ-साथ होनी चाहिए। मुंबई जैसी जीवंत और विविध नगरी में, राजनीतिक भाषा सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रह सकती।
हर बयान, हर निर्णय — चाहे चुनावी हो या संगठनात्मक इंसानियत, सम्मान और सामाजिक समरसता के भाव को छूना चाहिए।
साटम के इस सटकले बयान ने यह साबित किया है कि सत्ता की तेज़ी में भी मानवता की धीमी लेकिन स्थायी धड़कन सबसे अहम है !
अली रज़ा आबेदी
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