छी न्यूज़ और नफ़रत की दुकान... घटिया पत्रकारिता के ख़िलाफ ज़नता को ही आवाज़ उठाना होगा

Nov 6, 2025 - 16:18
Nov 6, 2025 - 22:03
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छी न्यूज़ और नफ़रत की दुकान...  घटिया पत्रकारिता  के ख़िलाफ ज़नता को  ही  आवाज़ उठाना होगा

ठाणे के ख़ान कंपाउंड में उच्च न्यायालय के आदेशानुसार प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हो चुकी है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि अवैध रूप से निर्मित सात इमारतों को ढहाया जाए।

यह पूरी तरह एक कानूनी कार्यवाही है — एक ऐसी प्रक्रिया जो नियम, न्याय और जवाबदेही पर आधारित है। इसमें न धर्म का प्रश्न है, न राजनीति का।

मगर अफ़सोस, देश की तथाकथित “मुख्यधारा” मीडिया ने इस कार्यवाही को एक और नफ़रती तमाशे में बदल दिया।

ज़ी न्यूज़ — या यूँ कहें “छी न्यूज़” — ने अपनी बुलेटिन में इस प्रशासनिक कार्रवाई को इस तरह प्रस्तुत किया मानो यह किसी धर्म या समुदाय पर हमला हो।

उनका आपत्तिजनक शीर्षक था —

“ख़ान कंपाउंड ढहा, बुर्क़ा गैंग देखता रहा!”

पत्रकारिता या ज़हर का प्रसार?

यह कोई समाचार नहीं, बल्कि सांप्रदायिक विष का प्रसारण है।

जब एक मीडिया संस्था समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आत्मा घायल हो जाती है।

ख़ान कंपाउंड की इमारतें अगर अवैध थीं, तो उन पर कार्रवाई होना न्यायसंगत है।

परंतु प्रश्न यह भी है कि,

जब ये अवैध इमारतें बन रहीं थीं, तब प्रशासन और सत्ता की निगाह कहाँ थी?

किसके संरक्षण में यह अवैध साम्राज्य खड़ा हुआ?

कानूनी दृष्टि

महाराष्ट्र प्रादेशिक नगर रचना अधिनियम, 1966 की धारा 53 और 54 स्पष्ट कहती है कि —

“किसी भी अवैध निर्माण पर संबंधित प्राधिकरण को बिना पक्षपात के कार्रवाई करने का अधिकार और दायित्व है।”

यह कानून हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू होता है !

फिर चाहे वह “ख़ान कंपाउंड” में रहता हो या “कपूर बिल्डिंग” में।

मुद्दा इमारत का नहीं, नीयत का है

मुद्दा यह नहीं कि इमारतें किसकी थीं 

मुद्दा यह है कि मीडिया की नीयत क्या है।

क्या अब हर खबर को धर्म, वेशभूषा या नाम के चश्मे से देखा जाएगा?

क्या “बुर्क़ा गैंग” कहना किसी नागरिक के सम्मान को तार-तार नहीं करता?

पत्रकारिता का पहला धर्म है — सत्य बोलना, न कि सांप्रदायिक रंग भरना।

मगर आज की “गोदी मीडिया” ने यह धर्म त्याग दिया है।

जनता को आगे आना होगा

जब मीडिया सत्ता की कठपुतली बन जाए,

जब सच्चाई को नफ़रत की चाशनी में डुबोकर परोसा जाए,

तब जनता को आगे आकर कहना होगा 

“बस करो! अब नफ़रत नहीं, इंसानियत चाहिए।”

ख़ान कंपाउंड की दीवारें ढही हैं 

मगर उससे पहले पत्रकारिता की दीवार गिर चुकी है।

अब ज़रूरत है उसे फिर से खड़ा करने की 

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