मैंमूना नर्गिस — भारत की विरासत को सांसें देने वाली ‘आर्ट डॉक्टर’
[ चिफ़ एडिटर सारा रज़ा आबेदी ]
जयपुर की शांत हवाओं में एक नाम गूंजता है — मैंमूना नर्गिस।
वो सिर्फ “कला संरक्षक” नहीं, बल्कि उन बेजान कलाकृतियों की “डॉक्टर” हैं जो सदियों से खामोश थीं।
राजस्थान से लेकर दिल्ली-मुंबई तक, उनके हाथों ने न जाने कितनी दीवारों, मूर्तियों, पेंटिंग्स और पांडुलिपियों को फिर से ज़िंदा किया है।
यह कहानी है उस महिला की है, जिसने इतिहास को सिर्फ संभाला नहीं, उसे सांसें दीं। जिसके हाथों मे आई हर कलाकृती को मिला नया जीवन !
राजस्थान के 16 संग्रहालयों से लेकर देश के प्रमुख एयरपोर्ट्स तक
मैंमूना नरगिस का नाम हर उस जगह दर्ज है जहां धरोहर ने फिर से आंखें खोलीं।
राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में मुग़लकालीन 600 मैन्युस्क्रिप्ट्स को पुनर्जीवित किया।
400 साल पुरानी 67 फीट लंबी गीता के टुकड़ों को जोड़ा।
750 साल पुरानी सोने से लिखी क़ुरान को अपने हाथों से ठीक किया बिना किसी मशीन के।
जैसलमेर के लुद्रवा जैन मंदिर का 400 साल पुराना दीमक-खाया रथ, बिना कील और बढ़ई के दोबारा चलाया। वो मुस्कुरा कर कहेती है !
“हर टूटी चीज़ में मैं एक कहानी देखती हूँ,”
“बस फिर से उसे दोबारा बोलने लायक बना देती हूँ।”
इतिहास की दीवारों में उनका जादू , एल्बर्ट हाॅल की फ्रेस्को, आमेर महल की अराइश दीवारे, नहारगढ के कला कक्ष, हवामहल के दरवाजे
कोटा म्यूजियम की अभ्रक मिनिएचर पेंटिंग्स, इन सबको उन्होने अपने हुनर से नया जीवन दिया है! उन्होने न सिर्फ पत्थर और रंगो को जोडा
बल्कि भारत की विरासत और वर्तमान के बीच पुल बनाया।
आधुनिकता की चमक में जब परंपरा खोने लगी,
मैंमूना नरगिस ने एयरपोर्ट्स को “मॉडर्न हैरिटेज स्पेस” बना दिया।
मुंबई एयरपोर्ट पर 200 साल पुरानी पालिताना कैनवस पेंटिंग के बिखरे टुकड़ों को जोड़कर नया जीवन दिया।
जयपुर एयरपोर्ट पर अडानी ग्रुप के साथ राजस्थान की पारंपरिक शीशमहल, ग्लास पेंटिंग और म्युरल आर्ट को पुनः सृजित किया।
दिल्ली एयरपोर्ट की दीवारों पर भी उनकी कलाकृतियों ने आधुनिक स्थापत्य में भारतीयता का रंग भर दिया।
“सीमेंट से बनी इमारत गर्म होती है, जबकि सुरखी-चूने से बनी इमारत 500 साल तक सांस लेती है।”
उनके प्रयासों से कई आर्किटेक्ट अब लाइम प्लास्टर, अराइश और सुरखी प्लास्टर की ओर लौट रहे हैं।
उनका उद्देश्य स्पष्ट है, भारतीय मिट्टी की इज्जत वापस लाना !
कला के साथ-साथ मैंमूना सामाजिक चेतना का चेहरा भी हैं।
राजस्थान मुस्लिम प्रोग्रेसिव फ़ेडरेशन की कोर कमिटी मेम्बर
मिर्ज़ा ग़ालिब सोसायटी, जयपुर की पूर्व प्रेसिडेंट
उन्होंने कई सेमिनार और वर्कशॉप्स के ज़रिए आम लोगों को समझाया
“हैरिटेज सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं, जनता की भी है।”
“संग्रहालयों में जाकर दीवारों पर नाम मत लिखिए।
आपका नाम इतिहास में तभी लिखा जाएगा जब आप उसे बचाएँगे।”
मैमुना नर्गिस को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जम्मू यूनिवर्सिटी, जम्मू फ़िक्की और हरियाणा करनाल की ओर से।
30 से अधिक राज्य स्तरीय सम्मान, जिनमें “राजस्थान की 100 प्रतिभाशाली महिलाओं” में शामिल होना भी है।
पर उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है ...
“वो पल जब कोई पुरानी चीज़ फिर से ज़िंदा होती है।” और इतिहास बोलने लगता है! मर्दो के बिच स्कैफोल्डिंग पर चढना, धुल और धुप मे काम करना आसान नही था ! सदियों पुरानी कलाओं को दोबारा ज़िंदा करना ये सब आसान नही था, पर मैंमुना नर्गिस ने साबित किया कि,
हुनर और हौसला अगर सच्चा हो, तो दीवारें भी कहानी कहने लगती हैं। उनका संदेश साफ़ है!
“विरासत सिर्फ देखने की चीज़ नहीं, संभालने की जिम्मेदारी भी है।”
आज जब आधुनिकता की चमक में लोग अपनी मिट्टी से दूर जा रहे हैं,
मैंमूना नरगिस हमें याद दिलाती हैं कि, विरासत हमारी पहचान है !
उनके हाथों ने सिर्फ कलाकृतियों को नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को नया जीवन दिया है! मैंमुना नर्गिस की कहानी एक ऐसी महिला की कहानी है, जिसने समय को पलटकर इतिहास को मुस्कुराना सिखाया है !
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